136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
रॉलेट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह-आंदोलन में ऐसा कुछ नहीं था जिससे हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच संघर्ष हो। इसके बावजूद श्री गांधी ने अपने अनुयायियों से यह प्रतिज्ञा लेने के लिए कहा। इससे पता चलता है कि वह शुरू से ही हिंदू-मुस्लिम एकता पर कितना जोर देते थे।
1919 में मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन के दो उद्देश्य थे - खिलाफत को जीवित रखना और तुर्की साम्राज्य की अखंडता बनाए रखना। इन दोनों ही उद्देश्यों का समर्थन नहीं किया जा सकता था। खिलाफत की रक्षा इस सीधी-सादी बात के कारण नहीं की जा सकती थी कि जिन तुर्कों के समर्थन में यह आंदोलन किया जा रहा था, वे स्वयं सुलतान को नहीं चाहते थे। जब वे एक गणराज्य चाहतें थे तो यह बात एकदम अन्यायपूर्ण थी कि तुर्कों को तुर्की में राजतंत्र बनाए रखने के लिए मजबूर किया जाए। तुर्की साम्राज्य की अखंडता पर जोर नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि इसका अर्थ यह होता कि विभिन्न राष्ट्रों के लोग तुर्क शासन, खासतौर पर अरबों के अधीन रहते, विशेषकर उस समय जब सभी पक्षों ने यह स्वीकार कर लिया था कि आत्मनिर्णय के अधिकार को शांति-स्थापना का आधार बनाया जाए।
यह आंदोलन मुसलमानों द्वारा शुरू किया गया था। फिर जिस दृढ़ निश्चय और आस्था से श्री गांधी ने उस आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली, उससे बहुत से मुसलमान स्वयं भी आश्चर्यचकित रह गए थे। अनेक लोगों ने खिलाफत आंदोलन की नैतिकता के बारे में संदेह प्रकट किया और श्री गांधी को इस आंदोलन से अलग रहने के लिए कहा, क्योंकि इसका नैतिक आधार ही संदेहास्पद था। परंतु श्री गांधी स्वयं खिलाफत आंदोलन को इतना न्यायपूर्ण मानते थे कि उन्होंने इस सलाह को मानने से इंकार कर दिया। श्री गांधी ने कई बार तर्क दिए कि यह आंदोलन न्यायसंगत है और इसमें शामिल होना उनका कर्तव्य है। इस संबंध में श्री गांधी का पक्ष उनके अपने शब्दों में इस प्रकार हैः
(1) मेरे विचार में तुर्की का दावा न केवल नैतिक और न्यायपूर्ण है,
बल्कि पूरी तरह न्यायोचित है, क्योंकि तुर्की केवल वही चाहता है
जो उसका अपना है। और मुस्लिम घोषणापत्र में निश्चित शब्दों में
घोषणा की गई है कि गैर-मुस्लिम और गैर-तुर्की जातियां अपने
संरक्षण के लिए जो भी गारंटी आवश्यक समझें, ले सकती हैं,
ताकि तुर्की के आधिपत्य के अंतर्गत ईसाई अपना और अरब अपना
स्वायत्तशासन चला सकें_