7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 146

पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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(2) मैं यह विश्वास नहीं करता कि तुर्क निर्बल या अक्षम या कू्रर हैं।

वे निश्चित रूप से असंगठित हैं और शायद उनके पास अच्छा

नेतृत्व नहीं है। इस बारे में निर्बलता, अक्षमता और कू्ररता का जो

तर्क अक्सर सुनाई पड़ता है, वह उन लोगों के बारे में दिया जाता

है जिनसे सत्ता छीन ली जाती है। तथाकथित नरसंहार के बारे

में कमीशन नियुक्त करने की मांग की गई थी, परंतु उसे कभी

स्वीकार नहीं किया गया। कुछ भी हो, दमन के विरुद्ध तो सुरक्षा

मिल सकती है_

(3) मैं पहले ही कह चुका हूं कि यदि हिंदुस्तानी मुसलमानों में मेरी

रुचि न होती तो मैं तुर्कों के कल्याण में उससे अधिक रुचि नहीं

लेता जितनी मेरी ऑस्ट्रियन या पोल लोगों के कल्याण में है। परंतु

एक हिंदुस्तानी होने के नाते, अपने साथी हिंदुस्तानियों के कष्टों और

दुःखों में भाग लेना मेरा कर्तव्य है। यदि मैं मुसलमान को अपना

भाई समझता हूं तो मेरा कर्तव्य है कि यदि मैं उसके विचार को

न्यायपूर्ण समझता हूं तो कष्ट के समय अपनी पूरी क्षमता से मैं

उसकी सहायता करूं_

(4) चौथी बात यह है कि हिंदुओं को मुसलमानों का साथ किस सीमा

तक देना चाहिए। इसलिए यह बात अपनी भावनाओं और अपनी राय

की होती है। एक न्यायपूर्ण कार्य के लिए तो यह उपयुक्त है कि

हम मुस्लिम भाइयों की खातिर अधिकतम कष्ट उठाएं। इसलिए जब

तक उनके द्वारा अपनाए गए उपाय शुद्ध होंगे, मैं पूरे रास्ते उनका

साथ दूंगा। मैं मुसलमान की भावनाओं पर नियंत्रण नहीं कर सकता।

मैं तो उसके उस वक्तव्य को स्वीकार कर लेता हूं कि खिलाफत

उसके लिए इस दृष्टि से धार्मिक प्रश्न है, कि वह अपनी जान पर

खेलकर भी उस लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश करेगा।य्ऽ

श्री गांधी खिलाफत के लिए न केवल मुसलमानों से सहमत थे, बल्कि इस काम में वह उनके मार्गदर्शक और मित्र भी बन गए। खिलाफत आंदोलन में श्री गांधी ने जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और उस आंदोलन और असहयोग आंदोलन में जो संबंध था, वह क्षीण हो गया, क्योंकि अधकितर लोग यह विश्वास करते थे कि कांग्रेस

ऽ यंग इंडिया, 2 जून, 1920