138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ने ही असहयोग आंदोलन शुरू किया है, और वह इसलिए कि यह स्वराज पाने का एक साधन है। यह विचार सब जगह घर कर गया था क्योंकि अधकिंश लोग यही देखकर संतुष्ट हो गए थे कि असहयोग आंदोलन और 7 और 8 सितंबर, 1920 को कलकत्ता में होने वाले कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में संबंध था, परंतु जिसने भी सितंबर 1920 के बाद की स्थिति का अवलोकन किया है वह जानता है कि यह विचार सही नहीं है। सच्चाई यह है कि असहयोग आंदोलन का उद्गम खिलाफत आंदोलन से हुआ था, न कि स्वराज के लिए कांग्रेसी आंदोलन से। खिलाफतवादियों ने तुर्की की सहायता के लिए इसे शुरू किया था और कांग्रेस ने उसे खिलाफतवादियों की सहायता के लिए अपनाया था। उसका मूल उद्देश्य स्वराज नहीं बल्कि खिलाफत था और स्वराज का गौण उद्देश्य बनाकर उससे जोड़ दिया गया था, ताकि हिंदू भी उसमें भाग लें और यह बात नीचे दिए गए तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है।
खिलाफत आंदोलन की शुरुआत 27 अक्तूबर, 1919 से हुई समझी जा सकती है क्योंकि इसी दिन देश भर में खिलाफत सम्मेलन हुआ। इस अधिवेशन में मुसलमानों ने इस बात की संभावना पर विचार किया कि क्या असहयोग करके अंग्रेज सरकार को खिलाफत की गलती दूर करने के लिए विवश किया जा सकता है। 10 मार्च, 1920 को कलकत्ता में खिलाफत सम्मेलन हुआ और उसमें यह फैसला कर लिया गया कि आंदोलन के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए असहयोग सर्वोत्तम हथियार हो सकता है।
9 जून, 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत सम्मेलन हुआ और वहां सर्वसम्मति से इस बात को दोहराया गया कि असहयोग का सहारा लिया जाए। सम्मेलन में इस काम के लिए एक कार्यकारी समिति गठित की गई जो विस्तृत कार्यक्रम तैयार करे और उसे लागू करे। 22 जून, 1920 को मुस्लिमों ने वायसराय को एक संदेश भेजा जिसमें कहा गया था कि यदि पहली अगस्त, 1920 से पूर्व तुर्क लोगों की शिकायतें दूर न कर दी गईं तो वे असहयोग आंदोलन शुरू कर देंगे। 30 जून, 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत कमेटी की बैठक हुई जहां यह तय किया गया कि वायसराय को एक महीने का नोटिस देकर असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया जाए। 1 जुलाई, 1920 को यह नोटिस दिया गया और 1 अगस्त, 1920 से असहयोग आंदोलन शुरू हो गया। इस संक्षिप्त विवरण से यह पता चलता है कि असहयोग आंदोलन खिलाफत कमेटी द्वारा शुरू किया गया था और कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में सिर्फ वही स्वीकार कर लिया गया जो खिलाफत सम्मेलन में पहले ही शुरू हो चुका था_ और वह स्वराज के लिए नहीं, बल्कि खिलाफत आंदोलन को बढ़ाने में मुसलमानों की सहायता करने के लिए था। कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में जो निम्न