140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
ने हिंदुओं को निमंत्रित किया था। फिर 3 जून, 1920 को इलाहाबाद में हिंदुओं और खिलाफत आंदोलनकारी मुस्लिमों की एक बैठक हुई। इस बैठक में, अन्य लोगों के अलावा सपू्र., मोतीलाल नेहरू और ऐनी बेसेंट भी शामिल हुए थे। परंतु हिंदू मुस्लिमों को सहयोग देने में संकोच कर रहे थे। श्री गांधी अकेले हिंदू थे जो मुस्लिमों के साथ हो गए थे। न केवल वह उनके साथ शामिल हुए, बल्कि उनसे कदम मिलाकर चले भी, यहां तक कि उनका नेतृत्व भी किया। 9 जून, 1920 को जब इलाहाबाद में खिलाफत सम्मेलन हुआ और उसमें असहयोग का विस्तृत कार्यक्रम बनाने तथा असली रूप देने के लिए एक कार्यकारी समिति बनाई गई तो उसमें श्री गांधी अकेले हिंदू थे। 22 जून, 1920 को मुस्लिमों ने वायसराय को एक संदेश भेजा कि यदि 1 अगस्त, 1920 से पहले तुर्क लोगों की शिकायतें दूर नहीं की गईं तो वे असहयोग शुरू कर देंगे। उसी दिन श्री गांधी ने भी वायसराय को एक पत्र भेजकर बताया कि खिलाफत आंदोलन न्यायपूर्ण है और खिलाफतवादियों की मांगे पूरी करना क्यों जरूरी हैं। उदाहरण के लिए, पहली अगस्त, 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू करने के बारे में 1 जुलाई, 1920 को वायसराय को जो नोटिस दिया गया था वह श्री गांधी ने दिया था न कि खिलाफतवादियों ने। और जब खिलाफतवादियों ने 31 अगस्त, 1920 को असहयोग आंदोलन शुरू किया तो उसके बारे में सबसे पहले श्री गांधी ने ही ठोस कदम उठाते हुए अपना मैडल वापस किया। खिलाफत आंदोलन का उद्घाटन करते हुए खिलाफत कमेटी के एक सक्रिय सदस्य के रूप में श्री गांधी ने अपनी पूरी शक्ति से कांग्रेस से आग्रह किया कि वह असहयोग आंदोलन को अपनाए और खिलाफत आंदोलन को मजबूत करे। इसी उद्देश्य से श्री गांधी ने पहली अगस्त से पहली सितंबर, 1920 तक खिलाफत के जन्मदाता अली बंधुओं के साथ सारे देश का दौरा किया और लोगों को असहयोग आंदोलन की आवश्यकता बताई। लोगों ने यह देखा कि इस बारे में श्री गांधी और अली अंधुओं के स्वर अलग-अलग हैं। जैसा कि ‘मॉडर्न रिव्यू’ ने लिखा, उनके भाषणों की पंक्तियों का अध्ययन करने पर यह जानना कठिन नहीं है कि एक के लिए तो दूर बसे तुर्की में खिलाफत की दयनीय दशा ही केंद्र बिंदु है, जबकि दूसरे की निगाह में हिंदुस्तान के लिए स्वराज प्राप्ति के लक्ष्य की ओर है।ऽ तथापि खिलाफत के बारे में श्री गांधी कांग्रेस को अपन साथ लेने में सफल हो गए। ख्1,
ऽ श्री गांधी ने ‘मॉडर्न रिव्यू’ के इस सुझाव का खंडन किया और कहा कि यह कू्ररतम निर्दयता है। 20
अक्टूबर, 1921 के ‘यंग इंडिया’ में श्री गांधी ने ‘मॉडर्न रिव्यू’ की आलोचना का जवाब देते हुए लिखा
कि हम दोनों के लिए ही खिलाफत केंद्र बिंदु है, मुहम्मद अली के लिए इसलिए कि यह उनका धर्म
है, मेरे लिए इसलिए कि खिलाफत के लिए जान देकर मैं मुसलमानों के चाकू से गाय की सुरक्षा
सुनिश्चित करता हूं, क्योंकि यह मेरा धर्म है।