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पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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काफी दिनों से हिंदू मुस्लिमों को अपनी तरफ करने के लिए बराबर प्रयास करते चले आए थे। कांग्रेस अपने और मुस्लिम लीग के बीच की खाई पाटने को बहुत उत्सुक थी। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 1913 में जो कदम उठाए गए और जिसके फलस्वरूप कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए, स्वामी श्रद्धानंद ने उस वर्ष लखनऊ में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन के अपने संस्मरणों में उसका बहुत ही सजीव चित्रण किया है। उनके शब्दों मेंः

फ्कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन के मंच पर बैठकर मैंने जो पहली बात देखी

वह यह थी कि 1893 में हुए लाहौर कांग्रेस अधिवेशन की अपेक्षा यहां

मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या चौगुनी थी। अधिकांश मुस्लिम प्रतिनिधियों

ने अपनी सादी पोशाक के ऊपर सोने-चांदी और रेशमी कढ़ाई वाले चोगे

पहने हुए थे। अफवाह यह थी कि ये चोगे कांग्रेसी तमाशे के लिए धनी

हिंदुओं ने पहन रखे हैं। कुल 433 मुस्लिम प्रतिनिधियों में से केवल 30

के लगभग ही बाहर से आए थे, शेष सभी लखनऊ शहर के थे। और

इनमें से अधिकांश को प्रतिनिधियों की सीटों पर मुफत में आने दिया

गया और उनके लिए भोजन और निवास की व्यवस्था मुफत की गई। सर

सैयद अहमद की एंटी कांग्रेस लीग ने मुसलमानों को कांग्रेस-प्रतिनिधि

के रूप में शामिल होने से निरुत्साहित करने के लिए एक आम सभा का

आयोजन किया था। इसका मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के लोगों ने

अधिवेशन शुरू होने से चार रात पहले से ही कांग्रेस शिविर में रोशनी

करनी शुरू कर दी और यह इश्तहार निकाले कि वह रात मुफत होगी।

इसका नतीजा यह हुआ कि उस रात लखनऊ के चंडूखाने खाली पड़े

रहे और लगभग 30,000 हिंदुओं और मुसलमानों की भारी भीड़ को छह

मंचों से संबोधित किया गया और उसी समय मुस्लिम प्रतिनिधियों का

चुनाव या पहचान की गई। यह बात मुझे लखनऊ कांग्रेस के आयोजकों

ने निजी रूप से बताई।

मुस्लिम प्रतिनिधियों का यह एक दिखावा मात्र था। एक मुस्लिम

प्रतिनिधि उर्दू में एक प्रस्ताव के समर्थन के लिए खड़ा हुआ। उसने बोलना

शुरू किया - फ्हज़रात, मैं एक मुसलमान प्रतिनिधि हूं।य् कोई एक हिंदू

प्रतिनिधि खड़ा हो गया और उसने मुसलमान प्रतिनिधियों के समर्थन में

तालियां बजाने को कहा_ और जितने उत्साहपूर्वक तालियां बजाई गईं वह

  1. असहयोग आंदोलन के बारे में 884 के मुकाबले 1886 मतों से प्रस्ताव पारित हो गया। स्व. तायरसी ने

मुझे बताय कि प्रतिनिधियों में से अधिकांश कलकत्ता के टैक्सी ड्राइवर थे, जिन्हें असहयोग के पक्ष में

वोट देने के लिए धन दिया गया था।