7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 151

142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

वर्णनातीत है।य्ऽ

खिलाफत आंदोलन का मुद्दा उठाकर श्री गांधी ने दो उद्देश्यों की पूर्ति की। एक तो मुस्लिमों का समर्थन पाने की कांग्रेसी योजना को उन्हें पूरा कर दिखाया। दूसरे, उन्होंने कांग्रेस को देश में एक शक्ति बना दिया, और यदि मुस्लिम कांग्रेस में शामिल न होते तो वह शक्ति नहीं बन सकती थी। मुसलमानों को राजनीतिक सुरक्षाओं की जगह खिलाफत का मुद्दा कहीं अधिक आकर्षक लगता था। इसका नतीजा यह निकला कि जो मुसलमान कांग्रेस के बाहर थे, वे भी भारी संख्या में कांग्रेस में शामिल हो गए। हिंदुओं ने उनका स्वागत किया, क्योंकि उन्हें लगा कि इस तरह वे अंग्रेजों के विरुद्ध सांझा मोर्चा खोल सकते हैं जो कि उनका उद्देश्य था। इसका श्रेय तो निश्चित रूप से श्री गांधी को जाता है। निस्संदेह यह एक बड़ा साहसपूर्ण काम था।

1919 में जब मुसलमानों ने हिंदुओं से असहयोग आंदोलन में शामिल होने का अनुरोध किया, जो उसे तुर्की और खिलाफत के समर्थन में चलाना चाहते थे, उस समय हिंदू तीन अलग-अलग गुटों में बंटे हुए थे। उनमें से एक गुट तो असहयोग का सिद्धांततः विरोध करता था। दूसरा गुट ऐसे हिंदुओं का था जो असहयोग की हलचल में इस शर्त पर शामिल होने को तैयार था कि मुसलमान गोहत्या छोड़ने को तैयार हो जाएं। तीसरा गुट ऐसे हिंदुओं का था जो इस आशंका से भयभीत थे कि मुसलमान असहयोग का उपयोग अफगानिस्तान को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण देने के लिए न कर दें, क्योंकि ऐसी हालत में हिंदुस्तान में स्वराज की जगह मुस्लिम राज्य स्थापित हो जाएगा।

श्री गांधी ने ऐसे हिंदुओं की चिंता नहीं की जो असहयोग आंदोलन में मुस्लिमों का साथ देने के विरोधी थे। परंतु बाकी लोगों से उन्होंने कहा कि आपका दृष्टिकोण दुर्भाग्यपूर्ण है। जो हिंदू मुस्लिमों से इस शर्त पर सहयोग करना चाहते थे कि वे गोहत्या करना छोड़ दें, उनसे श्री गांधी ने कहाः

फ्मेरा निवेदन है कि हिंदुओं को यहां गोरक्षा का प्रश्न नहीं उठाना चाहिए।

दोस्ती की कसौटी यह होती है कि मुसीबत पड़ने पर सहायता की जाए

और वह भी बिना शर्त। किसी सहयोग में शर्तें लगाई जाएं, यह मित्रता

नहीं होती, बल्कि व्यापारिक समझौता होता है। सशर्त सहयोग मिलावटी

सीमेंट जैसा होता है, जिससे कुछ जुड़ता नहीं। यह हिंदुओं का कर्तव्य है

कि यदि मुसलमानों की मांग उन्हें न्यायपूर्ण लगे, तो उन्हें सहयोग दें। यदि

मुसलमान स्वयं यह अनुभव करें कि उन्हें हिंदुओं की भावनाओं का आदर

ऽ1. ‘लिबरेटर’, 22 अप्रैल, 1926