144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
एक स्वैच्छिक प्रयास है और वह ऐसा ही रहना चाहिए। सारी बात स्वयं
मुस्लिमों पर निर्भर करती है। यदि मुस्लिम स्वयं अपनी सहायता करेंगे तो
उन्हें हिंदुओं ही सहायता मिलेगी ही, और सरकार को, भले ही वह कितनी
बड़ी और ताकतवर क्यों न हो, समूचे राष्ट्र के रक्तहीन विरोध के सामने
झुकना ही पड़ेगा।य्ऽ
दुर्भाग्यवश श्री गांधी की यह आशा कि किसी भी सरकार को भले ही वह कितनी बड़ी और ताकतवर क्यों न हो, समूचे राष्ट्र के रक्तहीन विरोध के सामने झुकना ही पड़ेगा, सच्ची सिद्ध नहीं हुई। असहयोग आंदोलन शुरू करने के एक वर्ष के भीतर ही श्री गांधी को यह स्वीकार करना पड़ा कि मुसलमान अधीर हो गए थे, औरः
फ्अपने धीरतापूर्ण गुस्से के कारण मुसलमानों ने कांग्रेस और खिलाफत
संगठनों से अधिक जोरदार और तत्काल कदम उठाने की मांग करनी शुरू
कर दी। मुसलमानों के लिए स्वराज का अर्थ है, ओर होना भी चाहिए,
खिलाफत के सवाल को सफलतापूर्वक हल करने में हिंदुस्तान की योग्यता।
इसलिए यदि स्वराज प्राप्ति का मतलब ऐसे कार्यक्रम में अनिश्चित विलंब
होना है, जिससे उन्हें यूरोपीय समुद्रों में नपुंसकों की तरह तुर्की का विनाश
देखना पड़े, तो मुसलमान प्रतीक्षा करना अस्वीकार करते हैं।य्
फ्इस दृष्टिकोण से, सहानुभूति न रखना असंभव है। यदि मुझे कोई
प्रभावकारी तरीका समझ में आता तो मैं अविलंब प्रसन्नतापूर्वक उसका
अनुमोदन कर देता। यदि स्वराज की गतिविधियों को मुल्तवी करने से
हम खिलाफत के उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सकें तो
मैं खुशी से ऐसा करने को तैयार हूं। इस कारण करोड़ों मुसलमानों को
जो पीड़ा हो रही है, उसे शांत करने के लिए यदि मुझे असहयोग के
बाहर भी कोई मार्ग सूझेंगे तो मैं बड़ी खुशी से उन्हें अपना लूंगा। पर
मेरी विनम्र सम्मति में खिलाफत की गलती को ठीक करने का फौरी
तरीका स्वराज प्राप्ति है। इस तरह मेरे लिए खिलाफत के प्रश्न का हल
स्वराज की प्राप्ति है और इसका विपरीत भी सच है। पीडि़त तुर्कों को
सहायता देने का हिंदुस्तान के पास एकमात्र तरीका यह है कि वह पर्याप्त
शक्तिशाली बने, जिससे कारगर प्रभाव डाल सकें। यदि वह समय रहते
इतना शक्तिशाली नहीं बनें जाता, तो हिंदुस्तान के पास कोई तरीका
ऽ ‘यंग इंडिया’, 20 जून, 1920