7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 154

पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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नहीं बचता और जो हो उसे भुगतने के लिए उसको तैयार रहना चाहिए।

एक लकवाग्रस्त व्यक्ति हाथ बढ़ाकर कैसे अपने पड़ौसी की सहायता

कर सकता है, सिवाए इसके कि अपने लकवे का इलाज करे? केवल

अज्ञानतावश अविवेकपूर्ण ढंग से, गुस्से में आकर हम हिंसा का सहारा

ले लें, तो उससे हम अपना गुस्सा भले ही प्रकट करें, परंतु तुर्की को

उससे कोई राहत पहुंचने वाली नहीं।य्

मुसलमान श्री गांधी की सलाह सुनने को तैयार नहीं थे। उन्होंने अहिंसा के सिद्धांत की पूजा करने से इन्कार कर दिया। वे स्वराज की प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं थे। वे तुर्की को सहायता और खिलाफत को बचाने के लिए सबसे त्वरित तरीका अपनाना चाहते थे। और अपनी अधीरता में आकर मुस्लिमों ने बिल्कुल वही किया जिसकी हिंदुओं को आशंका थी, अर्थात् अफगानों को भारत पर हमला करने का निमंत्रण देना। यह जानना संभव नहीं कि खिलाफतवादी किस हद तक अफगानिस्तान के अमीर से अपने सलाह मशविरे में आगे बढ़े। परंतु इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि वे ऐसी घातक परियोजना पर चल रहे थे। यह कहने की कोई जरूरत नहीं कि भारत पर हमला कराने की यह परियोजना नितांत खतरनाक परियोजना थी और हर बुद्धिमान हिंदुस्तानी अपने आपको पागलपन भरी इस परियोजना से दूर ही रखेगा। इस परियोजना में श्री गांधी की कितनी भूमिका रही, यह पता लगाना संभव नहीं। परंतु यह बात निश्चित है कि उन्होंने अपने को इससे अलग नहीं रखा। इसके विपरीत, स्वराज पाने के भ्रांतिपूर्ण उत्साह और हिंदू-मुस्लिम एकता की सनक के कारण, क्योंकि वही उसका एकमात्र तरीका लगता था, वह इस परियोजना का समर्थन करने को भी तैयार हो गए। श्री गांधी ने न केवल अमीर को यह सलाहऽ दी कि वह अंग्रेज सरकार से किसी किस्म की संधि न करें, बल्कि यह भी घोषणा कीः

फ्यदि अफगानिस्तान का अमीर ब्रिटिश सरकार कि विरुद्ध युद्ध करता है,

तो एक तरह से मैं उसकी निश्चित रूप से सहायता करूंगा। दूसरे शब्दों

में, मैं अपने देशवासियों को खुल्लमखुल्ला यह बताऊंगा कि जो सरकार

राष्ट्र का विश्वास खो चुकी है, उसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं

और ऐसी सरकार को सहायता देना एक अपराध होगा।य्

ऽ ‘यंग इंडिया’, 4 मई 1921