पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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माता की जय की जगह वंदे मातरम् को प्राथमिकता दूंगा, क्योंकि इसके
द्वारा हम बौद्धिक और भावनात्मक दृष्टि से बंगाल की श्रेष्ठता को मान
लेते हैं। और ‘हिंदू और मुसलमान की जय’ एक ऐसा नारा है जो हमें
कभी नहीं भूलना चाहिए।
इन नारों के बारे में कोई भी मतभेद नहीं होना चाहिए। जैसे ही कोई
इन तीनों में से एक भी नारा लगाए, तो केवल अपना प्रिय नारा बोलने
की जगह सभी को बाकी नारे भी बोल देने चाहिएं। जो इनमें शामिल नहीं
होना चाहते, वे भले ही नारा न लगाएं, परंतु जब एक नारा लगाया जा
चुका हो तो उसके बीच में अपना नारा लगाना तहजीब के खिलाफ माना
जाना चाहिए। बेहतर तो यही होगा कि ये तीनों नारे एक के बाद एक इस
तरह लगाए जाएं जैसा ऊपर दिया गया है।य्
हिंदू-मुसलमान एकता बनाने के लिए श्री गांधी ने सिर्फ यही बातें नहीं कीं। जब मुस्लिमों ने हिंदुओं के विरुद्ध घोर अपराध किए, तब भी उन्होंने मुसलमानों से उसके कारण नहीं पूछे।
यह सर्वविदित है कि कई प्रमुख हिंदुओं की, जिन्होंने अपनी लेखनी से या शुद्धि-आंदोलन में भाग लेकर, मुस्लिमों की धार्मिक भावनाओं को आघात पहुंचाया, उनकी कुछ कट्टठ्ठर मुसलमानों ने हत्या कर दी। सबसे पहले स्वामी श्रद्धानंद की 23 दिसंबर, 1926 को अब्दुल रशीद ने गोली मारकर उस समय हत्या कर दी जब वे बिस्तर पर बीमारी की हालत में लेटे हुए थे। उनके बाद लाला नानकचंद की हत्या की गई, जो दिल्ली के प्रसिद्ध आर्यसमाजी थे। 6 अप्रैल, 1929 को ‘रंगीला रसूल’ के लेखक राजपाल का उस समय कत्ल कर दिया गया जब वह अपनी दुकान पर बैठे हुए थे। सितंबर 1934 में अब्दुल कयूम ने नाथूराम शर्मा की हत्या कर दी। यह एक बड़ा दुस्साहसिक कार्य था, क्योंकि उस समय शर्मा सिंध के जुडीशियल कमिश्नर की अदालत में इस्लामिक इतिहास के बारे में एक पैंफलेट प्रकाशित करने को लेकर भारतीय दंड संहिता की धारा 195 के अंतर्गत मिली सजा के विरुद्ध अपनी अपील की सुनवाई का इंतजार कर रहे थे। हिंदू महासभा के सेक्रेटरी खन्ना पर 1938 में हिंदू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन के बाद बुरी तरह हमला किया गया, और वह जान खोने से बाल-बाल बचे।
यहां एक बहुत छोटी-सी सूची दी गई है और इसे आसानी से और लंबा किया जा सकता है। परंतु महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिंदुओं की हत्या की गई। मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह