148 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कत्ल किए। जहां कानून लागू किया जा सका, वहां हत्यारों को कानून के अनुसार सजा मिली_ तथापि मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निंदा नहीं की। इसके विपरीत उन्हें ‘गाजी’ बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आंदोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तों यहां तक कह गया कि कयूम नाथूरामल की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परंतु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।
श्री गांधी हिंसा की किसी भी और प्रत्येक घटना की निंदा करने से नहीं चूके और उन्होंने कांग्रेस को भी, उसकी इच्छा के विपरीत, ऐसी घटनाओं की निंदा करने के लिए विवश किया। परंतु इन हत्याओं पर श्री गांधी ने कभी विरोध प्रकट नहीं किया।ऽ ने केवल मुसलमानों ने इन जघन्य अपराधों की निंदा नहीं की, अपितु श्री गांधी ने भी कभी मुसलमानों से यह नहीं कहा कि वे इन हत्याओं की निंदा करें। वह उनके बारे में चुप्पी साधे रहे। उनके इस दृष्टिकोण की केवल यही व्याख्या की जा सकती है कि श्री गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखने को उत्सुक थे, और इसीलिए उन्होंने कुछ हिंदुओं की हत्या की कोई चिंता नहीं की बशर्ते उनके बलिदान से यह एकता बनी रहे।
मुस्लिमों की किसी भी गलती को माफ करने वाले इस दृष्टिकोण का, जब तक कि उससे हिंदू-मुस्लिम एकता को आघात न पहुंचे, सबसे अच्छा उदाहरण मोपला दंगों के बारे में श्री गांधी का वक्तव्य है।
मलाबार में मोपलाओं ने हिंदुओं पर जो हृदयविदारक अत्याचार किए थे, वे अवर्णनीय हैं। समग्र दक्षिण भारत में हरेक विचार के हिंदुओं में इनसे भय की एक भयानक लहर दौड़ गई थी, और जब खिलाफत के कुछ पथभ्रष्ट नेताओं ने मोपलाओं को मजहब की खातिर की जाने वाली इस जंग के लिए बधाई दी, तब दक्षिण भारत के हिंदू और भी उद्वेलित हो उठे। कोई भी व्यक्ति कह सकता था कि यह हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जरूरत से ज्यादा कीमत चुकाना था। किंतु श्री गांधी हिंदू-मुस्लिम एकता की जरूरत के बारे में इतने ज्यादा सनकी हो चुके थे कि उन्होंने मोपलाओं के
ऽ बताया गया है कि स्वामी श्रद्धानंद के हत्यारे अब्दुल रशीद की आत्मा की शांति के लिए देवबंद के
प्रसिद्ध इस्लामी कॉलेज के विद्यार्थियों और प्रोफेसरों ने पांच बार कुरान का पूरा पाठ किया और प्रतिदिन
कुरान की सवा लाख आयतों की तिलावत की गई। उनकी प्रार्थना थी कि ‘अल्लाह मियां मरहूम (अर्थात्
अब्दुल रशीद) को आला-ए-उलीयीन (सातवें बहिश्त) में स्थान दें। टाइम्स ऑफ इंडिया, 30.11.1927,
‘थू्र इंडियन आइज़’ नामक स्तंभ से।