पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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कारनामों और बधाई देने वाले खिलाफतवादियों की हरकतों को अनदेखा कर दिया। मोपलाओं के बारे में उन्होंने कहा कि मोपला भगवान से डरने वाले बहादुर लोग हैं और वे उस बात के लिए लड़ रहे हैं, जिसे धर्म समझते हैं_ और उस तरीके से लड़ रहे हैं जिसे धार्मिक समझते हैं। मोपलाओं के अत्याचारों के बारे में मुसलमानों की चुप्पी के बारे में श्री गांधी ने हिंदुओं को बतायाः
फ्हिंदुओं में इतना साहस और इतनी आस्था होनी चाहिए कि धर्मांधों
द्वारा की जाने वाली इन गड़बडि़यों के बावजूद वे अपने धर्म की रक्षा कर
सकें। मोपलाओं के पागलपन की मुसलमानों द्वारा की जाने वाली निंदा को
मुसलमानों की दोस्ती की कसौटी नहीं माना जा सकता। मोपला लोगों द्वारा
किए गए जबरन धर्म-परिवर्तन और लूटपाट के बारे में मुसलमानों को स्वयं
शर्मिंदगी होनी चाहिए और उन्हें चुप रहते हुए ऐसे प्रभावकारी ढंग से प्रयास
करने चाहिए कि उनमें से अधिकतम धर्मांध व्यक्तियों के लिए ऐसे काम
करने असंभव हो जाएं। मेरा यह विश्वास है कि हिंदुओं ने मोपला लोगों के
पागलपन का बड़े धैर्य से सामना किया है और संस्कृत मुसलमान ईमानदारी
से इस बात के लिए दुःखी हैं कि मोपला लोगों ने हजरत की शिक्षाओं को
गलत समझा है।य्
कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने मोपलाओं के अत्याचारों के बारे में जो प्रस्तावऽ पास किया, उससे पता चलता है कि कांग्रेस इस बारे में कितनी सावधान थी कि मुस्लिमों की भावनाओं को आघात न पहुंचे। प्रस्ताव इस प्रकार हैः
फ्वर्किंग कमेटी मलाबार के कुछ इलाकों में मोपला लोगों के हिंसात्मक
कार्यों पर घोर दुःख प्रकट करती है। ये कृत्य इस बात के प्रमाण हैं कि
हिंदुस्तान में अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने कांग्रेस और केंद्रीय खिलाफत
कमेटी के संदेश को नहीं समझा है और वह कांग्रेस और खिलाफत के हर
कार्यकर्ता से अनुरोध करती है कि वे हिंदुस्तान के चारों कोनों में अत्यधिक
उत्तेजना के बावजूद अहिंसा के संदेश का प्रसार करें।
तथापि जहां एक ओर वर्किंग कमेटी मोपलाओं द्वारा की गई हिंसा
की निंदा करती है, वहां वह यह भी बताना चाहती है कि उसके पास जो
ऽ प्रस्ताव में कहा गया है कि जबरन धर्म-परिवर्तन के केवल तीन मामले हैं। केंद्रीय धारा सभा में एक
प्रश्न के उत्तर में सर विलियम ने बताया कि मद्रास सरकार ने रिपोर्ट दी है कि जबरन धर्म परिवर्तन के
शायद हजारों मामले हुए हैं। परंतु जैसा कि स्पष्ट है, बिल्कुल सही अंदाजा लगाना कभी संभव नहीं
होगा। (डिबेट्स, 16 जनवरी, 1922)