पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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फ्एक और महत्वपूर्ण तथ्य की ओर मैं महात्मा गांधी का ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं। एक रात हम दोनों इकट्टòे नागपुर की खिलाफत कांफ्रेंस में गए। उस मौके पर मौलानाओं ने कुरान की आयतें पढ़ीं, जिनमें बार-बार जिहाद और काफिरों को मारने का आदेश था। परंतु जब मैंने उनका ध्यान खिलाफत आंदोलन के इस पहलू की ओर दिलाया तो महात्मा जी मुस्कराए और कहने लगे कि वे ब्रिटिश नौकरशाही की ओर इंगित कर रहे हैं। उत्तर में मैंने कहा कि यह सब तो अहिंसा के विचार का विनाश करने जैसा है, और जब मुस्लिम मौलानाओं के मन में उल्टी भावनाएं आ गई हैं, तो उन्हें इन आयतों का इस्तेमाल हिंदुओं के विरुद्ध करने से कोई रोक नहीं सकेगा।य्
स्वामी जी का तीसरा उदाहरण मोपलाओं के दंगों के बारे में है। ‘लिबरेटर’ की 26 अगस्त, 1926 के अंक में स्वामी जी ने लिखा हैः
फ्जब विषय समिति में हिंदुओं पर मोपलाओं के अत्याचारों की निंदा करने का प्रश्न आया, तब पहली बार चेतावनी दी गई थी। मूल प्रस्ताव में हिंदुओं की हत्याओं, हिंदू घरों को जलाने और हिंदुओं का जबर्दस्ती धर्म-परिवर्तन करने के लिए सारे मोपला लोगों की निंदा की गई थी। हिंदू सदस्यों ने स्वयं ही इसमें इतने संशोधन प्रस्तुत किए कि अंततः इन अपराधों के लिए कुछ थोड़े से व्यक्तियों की ही निंदा की गई। परंतु कुछ मुसिल्म नेताओं से इतना भी सहन नहीं हुआ। मौलाना फकीर और कुछ अन्य मौलानाओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और इससे कोई आश्चर्य भी नहीं हुआ। पर मुझे तो आश्चर्य तब हुआ जब मौलाना हसरत मोहानी जैसे पूरे राष्ट्रवादी ने भी इस आधार पर प्रस्ताव का विरोध किया कि मोपला इलाका अब ‘दारुन अमन’ नहीं रहा, बल्कि ‘दारुन हरब’ बन चुका है_ और उन्हें हिंदुओं पर इस बात का शक था कि वे मोपलों के अंग्रेज दुश्मनों से मिले हुए हैं। इसलिए मोपलों ने यह ठीक ही किया कि हिंदुओं के समाने कुरान या तलवार का विकल्प रखा। इसलिए यदि हिंदू अपने आपको मौत से बचाने के लिए मुसलमान बन गए तो इसे स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन कहा जाएगा न कि जबरन धर्म-परिवर्तन। और इतना सरल प्रस्ताव, जिसमें केवल कुछ मोपलाओं की निंदा की गई थी, भी सर्वसम्मति से पास नहीं हो सका, बल्कि बहुमत से पास हुआ। और भी ऐसे कई संकेत थे, जिनसे पता चलता था कि मुस्लिम यह समझते हैं कि कांग्रेस उनके द्वारा उठाए गए कष्टों के सहारे चल रही है और