152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
यदि उनके सनकीपन की जरा भी अवहेलना की गई, तो यह बनावटी
एकता टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगी।य्
अंतिम बात श्री गांधी द्वारा शुरू की गई विदेशी कपड़ों की होली जलाए जाने के बारे में है। 31 अगस्त, 1926 के ‘लिबरेटर’ में स्वामी जी लिखते हैंः
फ्जब लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विदेशी कपड़ों की होली जलाना
तमाम हिंदुस्तानियों का धार्मिक कर्तव्य है और सर्वश्री दास, नेहरू और अन्य
बहुत से चोटी के नेताओ ने हजारों रुपए के विदेशी वस्त्र जला दिए, वहीं
खिलाफतवादी मुसलमानों ने महात्मा जी से इस बात की विशेष अनुमति
प्राप्त कर ली कि वे सारा विदेशी कपड़ा अपने तुर्की भाइयों के उपयोग
के लिए भेज सकें। यह भी मेरे लिए बहुत बड़ा झटका था। जब सिद्धांत
का प्रश्न आया तो महात्मा जी अड़ गए और उन्होंने हिंदुओं की भावनाओं
की रत्ती भर परवाह नहीं की_ परंतु जब कभी मुसलमानों ने अपना कर्तव्य
निभाने में कोताही की, तो उनके लिए महात्मा जी के दिल में सदा एक
कोमल जगह बनी रही।य्
हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने वाले प्रयासों के इतिहास की दो घटनाओं का उल्लेख करना जरूरी है। एक उस उपवास या अनशन के बारे में है जो श्री गांधी ने 1924 में किया था। यह अनशन 21 दिन का था। अनशन शुरू करने से पहले श्री गांधी ने एक वक्तव्य जारी करके अनशन के कारणों के बारे में बताया। उसमें से कुछ उद्धरण नीचे दिए गए हैंः
फ्यह तथ्य कि जो हिंदू और मुसलमान दो वर्ष पहले तक मित्रों की तरह
काम कर रहे थे और अब कुछ जगहों पर कुत्तों और बिल्लियों की तरह
लड़ रहे हैं, यह दर्शातौ कि जो असहयोग उन्होंने किया था, वह वास्तव
में अहिंसक नहीं था। मैंने बंबई, चौरा-चौरी और कुछेक अन्य छोटे-मोटे
मामलों में इसके लक्षण देखे। मैंने इसके लिए पश्चाताप भी किया। इसका
मामूली प्रभाव पड़ा। परंतु इस हिंदू-मुस्लिम तनाव के बारे में तो मैं सोच
भी नहीं सकता था। कोहाट की दुखभरी त्रासदी सुनकर तो यह कतई
असहनीय लगा। साबरमती से दिल्ली जाते समय सरोजिनी नायडू ने मुझे
लिखा कि शांति के बारे में महज भाषणों और प्रवचनों से कुछ नहीं होने
वाला। मुझे इसके लिए कोई प्रभावकारी उपाय खोजना चाहिए। उन्होंने यह
जिम्मेदारी मुझे सौंपकर ठीक ही किया। क्या मैं लोगों की विशाल शक्ति
जागृत करने का साधन नहीं बना? अब यदि यह शक्ति आत्मविश्वास का