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पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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भागों में हिंदू-मुसलमानों के बीच शोचनीय सीमा तक तनाव बढ़ गया। गर्मियों में बहुत ही गंभीर सांप्रदायिक दंगे हुए। जुलाई में दिल्ली में हिंदू-मुसलमानों के बीच जोरदार झड़पें हुईं, जिनमें जानमाल की गंभीर क्षति हुई। उसी महीने में नागपुर में भी बहुत भयंकर दंगे हुए। अगस्त का महीना तो और भी खराब था। ब्रिटिश भारत में लाहौर, लखनऊ, मुरादाबाद, भागलपुर और नागपुर में दंगे हुए, और निजाम की रियासत में गुलबर्गा में गंभीर दंगे हुए। सितंबर-अक्तूबर में लखनऊ, शाहजहांपुर, काकिनाडा और इलाहाबाद में गंभीर फसाद हुए। वर्ष का सबसे भयंकर दंगा कोहाट में हुआ, जिसमें हत्याएं, आगजनी और लूट सब कुछ शामिल था।

1925-26 में हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य व्यापक रूप से फैल गया। इस वर्ष के हिंदू-मुस्लिम दंगों की विशेष बात यह थी कि ये व्यापक रूप से हुए और बार-बार हुए, कई बार तो छोटे-छोटे गांवों में भी हुए। कलकत्ता, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत और बंबई प्रेसिडेंसी सभी जगह दंगे हुए और दुःख की बात है कि कई जगह लोग मारे भी गए। अगस्त में छोटे-छोटे और स्थानीय हिंदू त्यौहारों के अवसर पर कलकत्ता में, बरार में, गुजरात में, बंबई प्रेसीडेंसी में और संयुक्त प्रांत में दंगे हुए। इनमें से कई स्थानों पर दोनों समुदायों में झगड़े हुए, पर बाकी जगह विशेषकर काकिनाडा में, जो कलकत्ता की घनी आबादी वाला पटसन-मिलों का इलाका है, वहां पुलिस हस्तक्षेप से गंभीर दंगा नहीं हो सका। गुजरात में इन दिनों हिंदू-मुस्लिम भावनाएं बहुत भड़की हुई थीं और कम से कम एक मामले में एक मंदिर को भ्रष्ट किया गया। सितंबर के अंत में हिंदुओं के महत्वपूर्ण त्यौहार रामलीला के अवसर पर कई जगह गंभीर चिंता व्याप्त हो गई। संयुक्त प्रांत के एक महत्वपूर्ण स्थान अलीगढ़ में तो इस त्यौहार के अवसर पर वर्ष का सबसे गंभीर दंगा हुआ। इन दंगों ने इतना खतरनाक रूप धारण कर लिया कि शांति स्थापित करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी। पुलिस की गोली और दंगाइयों द्वारा पांच आदमी मारे गए। लखनऊ में इसी त्यौहार के मौके पर एक बार तो विस्फोटक स्थिति पैदा हो गई थी, परंतु स्थानीय अधिकारियों ने दंगा होने से रोक दिया। अक्तूबर में बंबई में शोलापुर में गंभीर दंगा हुआ। वहां स्थानीय हिंदू एक कार में हिंदू मूर्तियों को शहर की सड़कों से ले जा रहे थे। जब वे एक मस्जिद के निकट पहुंचे, तो वहां हिंदू-मुसलमानों में विवाद हो गया, जो बाद में दंगों में बदल गया।

अप्रैल के शुरू में कलकत्ता में एक निंदनीय दंगा उस समय हुआ जब एक मस्जिद के बाहर मुस्लिमों और आर्यसमाजियों में गर्मा-गर्मी हो गई, जो फैलती गई और 5 अप्रैल को तो एक अवसर ऐसा आया जब पुलिस या फौज को उस भीड़ का सामना करना पड़ा जो प्रतिरोध के लिए उतारू थी और तब उसे शाम के समय गोली चलानी पड़ी। आगजनी की भी घटनाएं हुईं, और आगजनी के पहले तीन दिनों में ही