158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
फायर ब्रिगेड को 110 स्थानों पर आग बुझानी पड़ी। इन दंगों की एक अभूतपूर्व बात यह थी कि मुस्लिमों ने मंदिरों पर हमले किए और हिंदुओं ने मस्जिदों पर। सम्भवतः इससे कटुता बहुत ज्यादा बढ़ गई। कुल 44 लोग मारे गए और 584 जख्मी हुए। काफी कुछ लूट-मार भी हुई, जिससे व्यापार बंद कर देना पड़ा, जिसमें कलकत्ता को काफी आर्थिक हानि हुई। 5 अप्रैल के बाद दुकानें फिर से खुलनी शुरू हुईं, परंतु तनाव बना रहा। 14 अप्रैल को ईद थी। सिखों को 13 तारीख को एक जुलूस निकालना था, पर सरकार उसके लिए आवश्यक लाइसेंस नहीं दे सकी। सौभाग्यवश 13 और 14 अप्रैल के बारे में आशंकाएं ठीक साबित नहीं हुईं और 22 अप्रैल तक बाहरी तौर पर शांति बनी रही, जबकि एक गली में होने वाले मामूली से झगड़े के कारण यह भंग हो गई और दंगे पुनः भड़क उठे। छह दिनों तक दोनों समुदायों के गुटों में मामूली झड़पें और इक्के-दुक्के कत्ल और हमले होते रहे। इन दिनों मंदिरों या मस्जिदों पर कोई हमले नहीं हुए और कोई आगजनी या लूटपाट की घटना भी नहीं हुई। परंतु ऐसे कई मौके आए जब पुलिस के आ जाने के बाद भी उपद्रवी भीड़ तुरंत नहीं भागी और पुलिस को बारह बार गोली चलाना जरूरी हो गया। उपद्रवों के इस दूसरे दौर में 66 लोग मारे गए और 391 घायल हुए। पहले दंगों में व्यापार कहीं ज्यादा अस्त-व्यस्त हो गया था और मारवाड़ी व्यापारी घरानों के बंद हो जाने का प्रभाव यूरोपीय व्यापारिक फर्मों पर भी पड़ा। डर के कारण कई बाजार पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद हो गए थे और दो दिनों तक मांस की सप्लाई बंद-सी हो गई थी। डर इतना ज्यादा था कि उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में कूड़ा हटाना तक बंद हो गया। तथापि इस बात की व्यवस्था की गई कि सप्लाई न रुके और म्यूनिसिपैलिटी ने जैसे ही पुलिस-संरक्षण की मांग की, म्युनिसिपैलिटी के सफाई-कर्मचारियों की कठिनाई भी दूर कर दी गई। यद्यपि उपद्रवों का क्षेत्र थोड़ा-सा बढ़ गया, परंतु कलकत्ता के आसपास के मिल क्षेत्रों में कोई दंगे नहीं हुए। उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों के हिस्सों में सुनियोजित ढंग से की गई पुलिस-कार्रवाई, गुंडों की गिरफतारी, हथियारों के पकड़े जाने और ब्रिटिश सिपाहियों को तैनात करके पुलिस कुमुक बढ़ाने का वांछित प्रभाव पड़ा और अप्रैल के आखिरी तीन दिनों में इक्के-दुक्के हमलों और हत्याओं के बावजूद स्थिति बराबर सुधरती गई। छिटपुट कत्ल दोनों समुदायों के गुंडों के कारण हुए और पहली तथा दूसरी बार के दोनों दंगों में उनके कारनामों के कारण लोग यह जानने लगे कि ये गुंडे किराए के कातिल हैं। उन दंगों में एक और खास बात, जो बराबर देखने में आई, यह थी कि दोनों पक्षों द्वारा उत्तेजना फैलाने वाली मुद्रित सामग्री का वितरण और उसी के साथ किराए के गुंडों का उपयोग किया। इससे इस विश्वास को बल मिला कि दंगे कराने के लिए पैसा खर्च किया जाता है।
1926-27 के वर्ष में भी सांप्रदायिक दंगे बराबर होते रहे। अप्रैल 1926 में हर महीने दोनों समुदायों के समर्थकों में जोरदार झगड़े होते रहे और कानूनी भाषा के हिसाब