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पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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से केवल दो ही महीने ऐसे गुजरे, जब वास्तविक दंगे नहीं हुए। जिन परिस्थितियों में ये दंगे और झगड़े हुए, उनकी जांच कराने से पता चलता है कि वे या तो कुछ व्यक्तियों के बीच होने वाले छोटे-मोटे विवादों के कारण शुरू हुए, उदाहरण के लिए जैसे एक हिंद दुकानदार और मुस्लिम ग्राहक के बीच गर्मागर्मी, या फिर इस अशांति का कारण होता था किसी धार्मिक त्यौहार का मनाया जाना या इबादत के किसी मुस्लिम स्थानों के पास-पड़ोस में हिंदू जुलूस वालों द्वारा बैंड आदि बजाना। एक या दो दंगे तो केवल इसी कारण शुरू हो गए कि लोगों में तनाव और उत्तेजना बनी हुई थी। इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण था दिल्ली में 24 जून को हुआ झगड़ा। वह इस कारण शुरू हुआ कि एक भीड़-भाड़ वाले बाजार में एक खच्चर को कमरे में बंद कर दिया गया था। लोगों ने समझा कि दंगा शुरू हो गया है और दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर ईंटों और लाठियों से हमला करना शुरू कर दिया।

कलकत्ता में अप्रैल और मई 1926 में होने वाले दो दंगों संहित पहली अप्रैल, 1927 को समाप्त होने वाले वर्ष में कुल 40 दंगे हुए, जिनमें 197 लोग मरे ओर जख्मी होने वालों की संख्या 1598 थी। वैसे तो ये घटनाएं व्यापक रूप से हुइंर्, परंतु बंगाल, पंजाब और संयुक्त प्रांत में इनका गंभीर प्रभाव पड़ा। सबसे अधिक हानि बंगाल को उठानी पड़ी, परंतु बंबई प्रेसिडेंसी और सिंध में भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच काफी तनाव बना रहा। सारी गर्मियां कलकत्ता में आशंका बनी रही। पहली जून को एक मामूली-सी बात को लेकर दंगा भड़क उठा, जिसमें 40 लोग जख्मी हो गए। इसके बाद 15 जुलाई तक, जिस दिन हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार था, हिंसा की कोई खुली घटना नहीं हुई। त्यौहार के समय जो जुलूस निकाला गया, उसमें कुछ मस्जिदों के पास बैंड बजाने के कारण दंगे भड़क उठे, जिनमें 14 आदमी मारे गए और 116 जख्मी हुए। अगले दिन मुसलमानों का महत्त्वपूर्ण त्यौहार मुहर्रम था। उस दिन भी दंगे भड़क उठे। कुछ शांति के बाद 19, 20, 21 और 22 तारीख को फिर दंगे हुए। छुरेबाजी की इक्की-दुक्की घटनाएं 23, 24 और 25 तारीख को भी हुईं। इस अवधि के दंगों में 28 आदमी मारे गए और 226 घायल हुए। इसके बाद कलकत्ता में 15 सितंबर और 16 अक्तूबर को भी दंगे हुए और 16 अक्तूबर को तो पड़ौस के हावड़ा शहर में भी दंगे हो गए, जिनमें एक या दो आदमी मारे गए और 30 से अधिक जख्मी हो गए। अप्रैल और मई के दंगों में आगज़नी के कारण दंगों की विभीषिका बहुत बढ़ गई थी, परंतु सौभाग्यवश जुलाई के दंगों में आगज़नी की घटनाएं नहीं के बराबर हुईं। उदाहरण के लिए, आग पर काबू पाने के लिए फायर ब्रिगेड को केवल चार बार बुलाना पड़ा।

1927-28 में निम्नलिखित तथ्य हमारे सामने आते हैं। अप्रैल के शुरू से सितंबर 1927 के अंत तक कम से कम 25 दंगे हुए। इनमें से दस संयुक्त प्रांत में, 6 बंबई