160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
प्रेसीडेंसी में और दो-दो पंजाब, मध्य प्रांत, बंगाल और बिहार व उड़ीसा में और एक दिल्ली में हुआ। इनमें से अधिकांश दंगे धार्मिक त्यौहार मनाते समय एक या दूसरे समुदाय ने शुरू किए, जबकि कुछ मस्जिदों के पास बाजा बजाते समय हुए या मुस्लिमों द्वारा गाय मारे जाने के कारण हुए। इन दंगों में लगभग 103 व्यक्ति मारे गए और 1084 घायल हुए।
परंतु 1927 का सबसे भयंकर दंगा लाहौर में 4 और 7 मई के बीच हुआ। उपद्रव होने से कुछ समय पहले से दोनों समुदायों में भारी तनाव बना हुआ था और यह दंगा तब भड़क उठा जब अकस्मात एक मुसलमान और दो सिखों में टकराव हो गया और फिर उपद्रव बिजली की तेजी से फैले, जिनमें मृतकों की संख्या 27 और घायलों की 272 थी। ये हमले मुख्यतः असंगठित ढंग से इक्के-दुक्के व्यक्तियों पर किए जाते थे। दंगों की जगह पर पुलिस और फौज को तेजी से भेजा गया, और इसलिए बड़े गुटों के बीच व्यापक पैमाने पर झड़प नहीं हो सकी। तथापि कत्ल और हमले की छिटपुट घटनाएं 2-3 दिन तक होती रहीं और उसके बाद ही लाहौर की सड़कें और गलियां इक्के-दुक्के व्यक्तियों के लिए अकेले आने-जाने के लिए सुरक्षित हो सकीं।
मई में लाहौर के दंगों के बाद लगभग दो महीनों तक कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ, सिवाए जून के मध्य में बिहार व उड़ीसा में होने वाली एक छोटी सी घटना के अतिरिक्त। परंतु जुलाई में 8 से कम दंगे नहीं हुए, जिनमें सबसे भीषण था पंजाब के मुसलमान में, जो मुहर्रम के मौके पर हुआ। इस दंगे में 13 आदमी मारे गए और 24 घायल हुए। परंतु अगस्त में और भी भयंकर दंगे हुए। इस महीने में नौ दंगे हुए, जिनमें से दो में जान-माल का भारी नुकसान हुआ। बिहार व उड़ीसा के एक कस्बे बेतिया में एक धार्मिक जुलूस निकालने पर हुए दंगे में 11 आदमी मारे गए और 100 से अधिक जख्मी हुए, जबकि संयुक्त प्रांत के बरेली में मस्जिद के सामने से जुलूस निकालने के मौके पर हुए दंगे में 14 आदमी मारे गए और 165 जख्मी हुए। सौभाग्यवश, यह दंगा वर्ष के सांप्रदायिक दंगों के लिए एक मोड़ सिद्ध हुआ और सितंबर में केवल 4 दंगे हुए। तथापि इनमें से नागपुर में होने वाला दंगा लाहौर के दंगों से गंभीरता और जान-माल की क्षति के नाते से कुछ ही कम था। जिस चिंगारी से आग लगी, वह एक मुस्लिम जुलूस था, पर दंगों के लिए सामग्री काफी समय से तैयार हो रही थी। इन दंगों के परिणामस्वरूप 19 आदमी मारे गए और 123 घायलों को अस्पताल में भरती कराना पड़ा। इन दंगों के दौरान मुस्लिम समुदाय के कई लोग नागपुर से अपने घर छोड़कर चले गए। इस वर्ष के हिंदू-मुस्लिम संबंधों की एक खास बात यह थी, और जो दंगों से कम गंभीर नहीं थी, कि एक समुदाय के लोगों ने दूसरे