162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मामले में एक हिंदू जख्मी हो गया और बहुत बड़ी मात्रा में संपत्ति लूट ली गई, परंतु अफरीदी खसदारों ने यह पूरी की पूरी संपत्ति बरामद कर ली और अपराधियों पर इसके लिए जुर्माना किया। इसके बाद कबायली इलाका छोड़कर जाने वाले हिंदुओं की सुरक्षा के लिए सड़कों पर पुलिस तैनात कर दी गई। बाद में पॉलिटिकल एजेंट के दबाव में एक अफरीदी जिरगे ने जुलाई के अंत में हिंदुओं का बहिष्कार करने के आह्वान को रिसाला ‘वर्तमान’ के मुकदमें का फैसला होने तक स्थगित कर दिया। परंतु अगले सप्ताह खैबर दर्रे के सिरे पर लंदी कोतल में रहने वाले हिंदू परिवार कबायलियों के मुखियों के आश्वासनों पर भरोसा न करते हुए पेशावर की ओर चले गए। पर वे हर परिवार से एक-एक व्यक्ति को यहां छोड़ गए, जो उनकी जायदाद आदि हितों की रक्षा करता रहे। कुल मिलाकर अगस्त के मध्य तक, जब उपद्रवग्रस्त स्थिति निश्चित रूप से अपेक्षाकृत शांत होने लगी थी, लगभग चार सौ-साढ़े चार सौ हिंदू पुरुष, स्त्री और बच्चे पेशावर पहुंच चुके थे। कुछ हिंदुओं को निश्चित रूप से निकाल दिया गया। कुछ हिंदू धमकियों के कारण अपने घर छोड़ गए थे। कुछ लोग भयभीत होकर पलायन कर गए और कुछ अपने पड़ौसियों के साथ सहानुभूति में चले गए। कबायली इलाकों से निष्कासन और स्वेच्छा से पलायन अपने आप में असाधारण घटना थी। हिंदू वहां कई-कई पीढि़यों से रहते आए थे और वहां वे आदर और सम्मानपूर्वक रहते थे और कबायली रीति-रिवाजों के अभिन्न अंग थे। उनकी रक्षा करने के लिए कबायली एक-दूसरे से होड़ करते थे। उनेक कुल-बैरियों को कबायली अपना बैरी समझते थे। उत्तेजनावश लगभग 450 हिंदू कबायली इलाका छोड़कर चले गए थे और 1927 के अंत तक उनमें से 330 हिंदू कबायली क्षेत्र में अपने घरों को वापस आ गए। अधिकांश लोगों ने, कम से कम फिलहाल, ब्रिटिश हिंदुस्तान के अधिक सुरक्षित इलाके में रहना पसंद किया।
1928-29 का वर्ष अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्ण रहा। हिज एक्सेलेंसी लॉर्ड इर्विन ने केंद्रीन विधानसभा में और अन्यत्र भी अपने भाषणों में दोनों समुदायों के बीच विशेषकर राजनीतिक महत्व के उन प्रश्नों के बारे में समझौता कराने के लिए कोई आधार ढूंढने पर भारी बल दिया जो दोनों संप्रदायों के आपसी तनावपूर्ण संबंधों का कारण थे। सौभाग्यवश, 1929 में नियुक्त साइमन कमीशन ने जिन प्रश्नों की जांच की और उससे जो समस्याएं या मुद्दे सामने आए, उन पर विभिन्न समुदायों की शक्ति और ध्यान लग गया, जिसके परिणामस्वरूप झगड़ों के स्थानीय कारणों को अधिक महत्व न दिया जाकर वैधानिक नीति संबंधी मामलों को अधिक महत्व दिया गया। इसके अलावा, 1927 में भारतीय विधानसभा के शरदकालीन अधिवेशन द्वारा दोनों