164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
पर पथराव शुरू कर दिया और गांव में प्रवेश करने की चेष्टा की। पुलिस सुपरिटेंडेंट ने भीड़ को वहां से चले जाने की चेतावनी दी, पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसलिए और चेतावनी देने के लिए उसने अपने रिवाल्वर से एक गोली चला दी। इसके बावजूद भीड़ आगे बढ़ती गई और सुपरिटेंडेंट ने अपनी पुलिस-पार्टी को गोली चलाने की आज्ञा दे दी। पहले पुलिस पार्टी ने केवल एक बार गोली की बौछार की, परंतु चूंकि इस पर भी भीड़ तितर-बितर नहीं हुई, इसलिए दो बार और गोलियों की बौछार की, इससे धीरे-धीरे भीड़ का खिसकना शुरू हो गया और जाते-जाते वह गांव के कुछ पशुओं को अपने साथ हांक ले गई।
एक तरफ जब पुलिस वहां व्यस्त थी तो कुछ हिदूं काश्तकार दूसरी तरफ से सोफता गांव में घुस गए और गांव को जलाने की चेष्टा की। परंतु उन्हें पुलिस ने
खदेड़ दिया। लेकिन वे तीन-चार आदमियों को जख्मी कर गए। कुल मिलाकर 14 व्यक्ति मारे गए और 33 जख्मी हुए। पंजाब सरकार ने इस मामले की जांच कराने के लिए एक जुडिशियल अफसर (न्यायिक अधिकारी) को नियुक्त किया। उसकी रिपोर्ट 6 जुलाई को प्रकाशित की गई और उसने भीड़ पर पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने की कार्रवाई को उचित ठहराया और यह राय दी कि यह मानने का कोई कारण नहीं कि जरूरत से ज्यादा गोलियां चलाई गईं। भीड़ के द्वारा गैर-कानूनी तौर पर हमला करना बंद कर देने के बाद भी गोली चलाई जाती रहीं। रिपोर्ट में आगे कहा गया कि यदि पुलिस गोली न चलाती, तो उनकी अपनी जिंदगी तथा सोफता के लोगों की जान भी तत्काल खतरे में पड़ जाती। रिपोर्ट लिखने वाले अधिकारी ने अंत में लिखा कि यदि सोफता गांव में हमला और लूटमार करने दी जाती तो 24 घंटों के अंदर ही सोफता के आसपास के गांवों में भी निश्चित रूप से भयंकर सांप्रदायिक उपद्रव शुरू हो जाते।
खड़गपुर एक महत्वपूर्ण रेलवे केंद्र है, जो कलकत्ता से बहुत दूर नहीं है। वहां भी दंगे हुए, जिनमें जान-माल का भारी नुकसान हुआ। खड़गपुर में दो बार दंगे हुए, एक बार जून के अंत में मुहर्रम के मौके पर और फिर 1 सितंबर, 1928 को गाय की हत्या के कारण। पहले दंगे में 15 आदमी मारे गए और 21 जख्मी हुए, जबकि दूसरे दंगे में 9 लोग मारे गए और 35 घायल हुए। परंतु इनमें से कोई भी दंगा अपनी विकरालता में बंबई के दंगों की तुलना नहीं कर सकता, जो शुरू होकर फरवरी के मध्य तक चले और जैसा कि हम देख चुके हैं, इनमें 149 व्यक्ति मारे गए और 700 से भी अधिक जख्मी हुए।
पिछले वर्षों में सांप्रदायिक दंगे सार्वजनिक जीवन का एक खुला और निंदनीय