पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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भाग बन गए थे, परंतु 1929-30 में इनकी पुनरावृत्ति अपेक्षाकृत बहुत कम हो गई थी। केवल 12 दंगे इतने महत्वूपर्ण लगे, जिनकी रिपोर्ट हिंदुस्तान की सरकार को की गई और इनमें भी केवल बंबई शहर के दंगे ही वास्तव में गंभीर थे। 23 अप्रैल के शुरू में होने वाले दो दंगे छिटपुट रूप में मई के मध्य तक चलते रहे, जिनमें 35 जानें गईं और लगभग 200 लोग घायल हुए। एक घटना, जिससे अप्रैल में पर्याप्त तनाव फैल गया, वह थी लाहौर के निवासी राजपाल की हत्या, जिसके पैंफलेट ‘रंगीला रसूल’ में इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद पर घृणित आरोप लगाए गए थे और जिसके कारण पिछले वर्षों में काफी तनाव बना रहा था और कई कानूनी तथा राजनीतिक जटिलताएं भी पैदा हो गई थीं। सौभाग्यवश, दोनों संप्रदायों ने हत्या के बाद तथा फिर अपराधी को फांसी दिए जाने पर तथा उसके दाह-संस्कार के समय, काफी संयम से काम लिया_ और यद्यपि भावनाएं उभरी हुई थीं, परंतु कोई गंभीर दुर्घटना नहीं हुई।
सन् 1930-31 में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ। इससे देशभर में दंगे और उपद्रव शुरू हो गए। ये अधिकांशतः राजनीतिक थे तथा पुलिस और कांग्रेस के स्वयंसेवकों में होते थे। परंतु जैसा कि हिंदुस्तान में हमेशा होता है, इन राजनीतिक उपद्रवों में सांप्रदायिक रंग ले लिया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कोंग्रेस ने वालंटियरों के सहारे सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने के लिए मुसलमानों पर दबाव डालने का प्रयास किया और मुस्लिमों ने इस दबाव में आने से इंकार कर दिया। परिण् ाम यह निकला कि यद्यपि यह वर्ष शुरू तो राजनीतिक उपद्रवों से हुआ था, किंतु उसका अंत बहुत से सांप्रदायिक दंगों से हुआ, जिनमें से कई तो भयंकर थे। इनमें से सबसे भीषण दंगा सिंध में सक्कुर के आसपास 4 से 11 अगस्त के बीच हुआ, जिसने लगभग एक सौ से अधिक गांवों को अपनी चपेट में ले लिया। मेमनसिंह जिले (बंगाल) के किशोरगंज सबडिवीजन में भी 12-15 जुलाई तक होनेवाला सांप्रदायिक दंगा व्यापक पैमाने पर हुआ था। इसके अतिरिक्त 3 अगस्त को बलिया (संयुक्त प्रांत) में, 6 सितंबर को नागपुर में, और 6-7 सितंबर को बंबई में भी सांप्रदायिक दंगे हुए। 31 अक्तूबर को तिरूचेंदुर (मद्रास) में हिंदुओं और ईसाइयों में दंगा हुआ। 12 फरवरी को अमृतसर में एक हिंदू व्यापारी की हत्या करने का प्रयास किया गया, क्योंकि उसने पिकेटिंग करने वालों की बात नहीं मानी थी। एक दिन पहले ही ऐसी घटना बनारस में भी हुई थी, जिसके काफी भयंकर परिणाम निकले। इस मामले में शिकार एक मुस्लिम व्यापारी था और उस पर किया गया हमला जानलेवा था। चूंकि अधिकांश उत्तरी हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम संबंधों में तनाव व्याप्त था, इसलिए एक भीषण सांप्रदायिक उपद्रव शुरू हो गया, जो पांच दिन तक चलता रहा और जिसमें जान-माल की भारी क्षति हुई। इसी अवधि में 25 जनवरी को निलफामरी (बंगाल)