7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 176

पाकिस्तान का हिंदू विकल्प

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सेलम कस्बे के निकट किटिचिपलैयम में हुआ। झगड़ा उस समय शुरू हुआ जब एक गली में कुछ हिंदू युवकों के खेल में मुसलमानों ने गड़बड़ी पैदा करने की कोशिश की। 15 मार्च को कुरनूल जिले में पोलिकाल गांव में हिंदुओं के एक जुलूस मार्ग को लेकर हिंदू-मुस्लिम उपद्रव हो गया, परंतु पुलिस की एक छोटी-सी टुकड़ी ने दंगाइयों को भगाने में सफलता पाई। पंजाब में उस वर्ष कुल 907 दंगे हुए, जबकि 1929 में 813 दंगे हुए थे। उनमें से बहुत से सांप्रदायिक ढंग के थे और प्रांत के कई भागों में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच काफी तनाव बना रहा। यद्यपि संयुक्त प्रांत में 1930 के दौरान सांप्रदायिक तनाव उतना ज्यादा नहीं था जितना कि 1931 के पहले तीन महीनों में हो गया और यद्यपि सविनय अवज्ञा आंदोलन की गहमागहमी में इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया, फिर भी तनाव की गई घटनाएं हुईं और परस्पर असहमति के कारण सदा की तरह बने रहे। देहरादून और बुलंदशहर में आम ढंग के दंगे होते रहे और बलिया शहर में हिंदुओं के एक जुलूस के रास्ते को लेकर काफी गंभीर दंगा हो गया तथा पुलिस को गोली चलानी पड़ी। मथुरा, आजमगढ़, मैनपुरी और कई अन्य स्थानों में भी दंगे हुए।

1931-32 की घटनाओं पर, गोलमेज सम्मेलन में संवैधानिक चर्चा की प्रगति को लेकर निश्चित रूप से प्रतिक्रिया हुई और उससे मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों में कुछ घबराहट फैल गई कि बहुमत के आधार पर चलने वाले संविधान के अंतर्गत उनकी स्थिति क्या होगी। गोलमेज सम्मेलन के पहले अधिवेशन से यह निकट से देखने का मौका मिला कि भविष्य का संविधान कैसा होगा। तब तक औपनिवेशिक दर्जे की चर्चा एक अस्पष्ट धारणा से आगे नहीं बढ़ी थी। परंतु सम्मेलन के प्रारंभ में रजवाहों की घोषणा से एक संघीय सरकार के रूप में केंद्र पर जिम्मेवारी आ गई थी और यह स्पष्ट परिलक्षित होने लगा था। इसलिए मुस्लिमों को लगा कि अब समय आ गया है जब अपनी स्थिति का जायजा लिया जाए। यह बेचैनी गांधी-इर्विन समझौते के कारण और भी बढ़ गई थी, जिससे उन्हें लगता था कि कांग्रेस को कुछ विशेष सुविधाएं मिल गई हैं, कांग्रेस की स्थिति कुछ ऊंची हो गई है और सरकार पर उसकी जीत हुई है जिससे मुसलमानों का डर बना रहा। ‘पैक्ट’ के तीन हफते के अंदर कानपुर में एक भीषण दंगा उस समय शुरू हो गया जब शहीद भगतसिंह को 23 मार्च को फांसी दिए जाने की याद में हड़ताल रखने के लिए कांग्रेस ने मुस्लिम दुकानदारों पर भी दबाव डाला। 24 मार्च को हिंदू दुकानों की लूट शुरू हो गई। 25 मार्च को भारी आगजनी हुई। दुकानों और मंदिरों को आग लगा दी गई और उन्हें राख कर दिया गया। अव्यवस्था, लूटपाट, आगजनी, हत्याएं तेजी से होने लगीं। पांच सौ परिवार घर छोड़कर भाग गए और उन्होंने गांवों में शरण ली। सबसे अधिक हानि डॉ. रामचंद्र को