7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 177

168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

हुई। उनके परिवार के सभी सदस्यों, पत्नी और उनेक बूढ़े मांप-बाप की हत्या कर दी गई और उनकी लाशें गंदे नाले में फेंक दी गईं। उसी कत्ले-आम में श्री गणेश शंकर विद्यार्थी को भी अपनी जान देनी पड़ी। कानपुर दंगा जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन दंगों में अभूतपूर्व हिंसा और विशेष प्रकार के अत्याचार हुए, जो बहुत ही तेजी से सारे श्हार में और उसके बाहर भी फैल गए। कत्ल, आगजनी और लूटपाट की घटनाएं तीन दिन तक व्यापक पैमाने पर होती रहीं। उसके बाद ही उन पर नियंत्रण पाया जा सका और फिर ये धीमे-धीमे शांत हुए। जान-माल का इनमें भारी नुकसान हुआ। तीन सौ मौतों की तो तसदीक हो गई, किंतु कहा जाता है कि मृतकों की संख्या कहीं ज्यादा, शायद चार और पांच सौ के बीच थी। बड़ी संख्या में मंदिर और मस्जिद अपवित्र किए गए या जला दिए गए या नष्ट कर दिए गए। बहुत बड़ी संख्या में घरों को भी या तो जला दिया गया या लूट लिया गया।

यदि कांग्रेस के समर्थकों का बर्ताव उत्तेजनात्मक न होता तो ये सांप्रदायिक दंगे नहीं होते। यह दंगा हिंदुस्तान में पिछले कई वर्षों में होने वाले दंगों में सबसे भीषण और भयंकर था। इससे भी बढ़कर यह दंगा शहर के पास-पड़ौस के गांवों में भी फैल गया, जहां बाद में भी कई दिनों तक झड़पें होती रहीं।

1932-33 का वर्ष सांप्रदायिक आंदोलनों और उपद्रवों से अपेक्षाकृत मुक्त रहा। स्थिति में स्वागतयोग्य यह सुधार निस्संदेह कुछ तो अराजकता को दबाने के कारण और कुछ नए विधान के अंतर्गत मुसलमानों की स्थिति की अनिश्चितता दूर होने के कारण हुआ।

परंतु समूचे 1933-34 में देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ना शुरू हो गया और दंगे न केवल होली, ईद और मुहर्रम जैसे त्यौहारों के मौकों पर हुए, बल्कि दैनिक जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर भी हुए, जिससे पता चलता है कि वर्ष के शुरू से ही सांप्रदायिक सौहार्द में गिरावट आ रही थी। होली के मौके पर संयुक्त प्रांत के बनारस और कानपुर में तथा पंजाब के लाहौर और पेशावर में दंगे हुए। बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी को लेकर संयुक्त प्रांत के अयोध्या में, बिहार व उड़ीसा के भागलपुर में और मद्रास के कन्नानूर में गंभीर दंगे हुए। संयुक्त प्रांत के गाजीपुर जिले में भी गंभीर दंगा हुआ, जिसमें कई जानें गईं। अप्रैल और मई में बिहार व उड़ीसा में, बंगाल में, सिंध में और दिल्ली में कई स्थानों पर दंगे हुए, जिनमें कुछ तो मामूली-सी बातों को लेकर उत्पन्न उत्तेजना से शुरू हो गए थे। जैसे, दिल्ली में एक मुस्लिम दुकानदार ने राह चलते एक हिंदू पर अनजाने में थूक दिया। ब्रिटिश हिंदुस्तान में सांप्रदायिक झगड़े बढ़ाने का प्रभाव देसी रियासतों पर भी पड़ा, जहां कई दंगे हुए।