पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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जून से अक्तूबर के महीनों में सांप्रदायिक अशांति से पता चलता है कि दोनों प्रमुख संप्रदायों के बीच सामान्य रूप में कितना गहरा वैर-भाव व्याप्त था। जून और जुलाई के महीने, जब कोई हिंदू या मुस्लिम त्यौहार नहीं पड़ता, गड़बड़ से अपेक्षाकृत बचे रहे, यद्यपि बिहार के कुछ इलाकों में अतिरिक्त पुलिस भेजनी पड़ी। आगरा में एक लंबा विवाद शुरू हो गया। शहर के मुसलमानों ने इस बात पर आपत्ति की कि कुछ हिंदू घरों में पूजा-पाठ के शोर से पड़ोस की मस्जिद में नमाज पढ़ने में बाधा पहुंचती है। इस झगड़े का हल होने से पहले ही बीस जुलाई को और फिर दो सितंबर को दंगे हो गए, जिनमें चार आदमी मारे गए और अस्सी से ज्यादा घायल हुए। 3 सितंबर को मद्रास में हुए दंगे में एक आदमी मारा गया और तेरह लोग जख्मी हुए। इसका कारण यह था कि हिंदुओं ने एक पुस्तक प्रकाशित की थी जिसमें हजरत मोहम्मद पर कुछ आक्षेप किए गए थे। उसी महीने में पंजाब तथा संयुक्त प्रांत में भी कई स्थानों पर छोटे-मोटे दंगे हुए।
1934-35 के दौरान, 29 जून को लाहौर में उस समय स्थिति गंभीर हो गई। जब मुस्लिमों और सिखों के बीच एक मस्जिद को लेकर विवाद शुरू हो गया, जो गुरुद्वारा शहीदगंज की चारदीवारी के भीतर बनी हुई थी। यह झगड़ा काफी समय से सुलग रहा था। तनाव उस समय बढ़ा जब मुस्लिम विरोध के बावजूद सिखों ने मस्जिद तोड़नी शुरू कर दी। इस इमारत को लेकर काफी समय से मुकदमेबाजी चली आ रही थी, जिसमें सिखों के स्वामित्व को मान लिया गया था।
29 जून को 3 या 4 हजार मुस्लिमों की भीड़ गुरुद्वारे के सामने जमा हो गई। स्थानीय अधिकारियों ने तत्काल कार्रवाई करके इस भीड़ और गुरुद्वारे के अंदर जमा सिखों से वचन लिया कि सिख इस इमारत को और ज्यादा नहीं तोड़ेंगे। परंतु अगले सप्ताह जब नेताओं में एक सौहार्दपूर्ण समझौता कराने की जोरदार कोशिशें की जा रही थी, सिखों ने उग्रवादियों के दबाव में आकर मस्जिद को फिर गिराना शुरू कर दिया। उससे सरकारी अधिकारियों की स्थिति बड़ी दयनीय हो गई। सिख अपने कानूनी अधिकारों के अंतर्गत ही काम कर रहे थे, और मस्जिद गिराने को रोकने का एकमात्र प्रभावकारी तरीका गोली चलाना था। लेकिन चूंकि गुरुद्वारा सिखों से भरा हुआ था और सिख गुरुद्वारे की चारदीवारी के ही भीतर थे, गोली चलने से न केवल भारी
खून-खराबा होता, बल्कि धार्मिक कारणों से भी सारे प्रांत के सिखों पर इसकी भीषण प्रतिक्रिया होती। दूसरी ओर, सरकार यदि कोई कार्रवाई नहीं करती, तो धार्मिक कारणों से मुस्लिमों में भी भारी रोष पैदा हो जाता। इस बात की आशंका थी कि इससे कहीं सिखों और सरकारी सिपाहियों पर छिटपुट हमले शुरू न हो जाएं।