7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 179

170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

यह आशा की जाती रही थी कि दोनों संप्रदायों के नेताओं में चर्चा करके कोई समझौता हो जाएगा, परंतु शरारतपसंद लोगों ने अपने सहधर्मियों के दिमागों को उत्तेजित कर दिया। मुख्य शरारतपसंद लोगों की गिरफतारी के बावजूद उत्तेजना बढ़ती गई। सरकार ने सद्भावना प्रदर्शित करने की खातिर एक अन्य मस्जिद पर अधिकार दिला देने की बात कही, जिसे उसने कुछ वर्ष पहले खरीदा था। परंतु इसका कोई असर नहीं हुआ। 19 जुलाई को स्थिति बद से बदतर हो गई और अगले दो दिनों में तो स्थिति बहुत ही विस्फोटक हो गई। सेंट्रल पुलिस स्टेशन को वास्तविक तौर पर भारी भीड़ ने घेरे रखा, जिसका इरादा बहुत खतरनाक लगता था। बिना गोली चलाए उन्हें तितर-बितर करने की कोशिश असफल सिद्ध हो गई और फौजियों को 20 जुलाई को दो बार और 21 जुलाई को आठ बार गोली चलानी पड़ी। कुल मिलाकर 23 राउंड गोलियां चलाई गईं और 12 आदमी मारे गए। फौज और पुलिस के बहुत से जवानों को भी मामूली चोटें आईं।

गोली चलाए जाने के फलस्वरूप भीड़ तितर-बितर हो गई और फिर इकट्टòी नहीं हुई। दूसरे प्रांतों से भी पुलिस बुलाई गई और फौज को भी अतिरिक्त कुमुक भेजी गई। सरकारी नियंत्रण पुनः तेजी से स्थापित हो गया, परंतु धार्मिक नेता आंदोलन को भड़काते रहे। दीवानी मुकदमेबाजी फिर शुरू हो गई और कई मुस्लिम संगठनों ने लंबी-चौड़ी मांगें रखनी शुरू कर दीं।

वर्ष के अंत तक लाहोर की स्थिति को लेकर चिंता बनी रही। 6 नवंबर को एक मुस्लिम ने एक सिख को घायल करके मार दिया। तीन दिन बाद एक बड़ा भारी हिंदू-सिख जुलूस निकाला गया। आयोजक इस बात के लिए बहुत उत्सुक थे कि झगड़े से बचा जाए, परंतु फिर भी एक गंभीर झगड़ा हो गया। अगले दिन और दंगे हुए। परंतु यदि पुलिस और सेना सतर्कता से शीघ्र कदम न उठाती तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती और जान-माल की भारी क्षति हो सकती थी।

19 मार्च, 1935 को कराची में एक गंभीर घटना हज़रत मुहम्मद के बारे में एक आपत्तिजनक पुस्तक के लेखक नाथुरामल के हत्यारे अब्दुल कयूम को फांसी दिए जाने के बाद हुई। अब्दुल कयूम की लाश को लेकर जिला मजिस्ट्रेट पुलिस पार्टी के साथ उसके परिवार वालों को देने उनके घर गया, ताकि उसे शहर के बाहर दफन कर दिया जाए। दफन करने वाली जगह पर एक भारी भीड़ इकट्टòी हो गई, जिसमें अनुमानतः पच्चीस हजार लोग थे। यद्यपि अब्दुल कयूम के रिश्तेदार लाश को कब्रिस्तान में गाड़ देने के इच्छुक थे, परंतु भीड़ में शामिल लोग जुलूस बनाकर लाश को शहर ले जाना चाहते थे। स्थानीय अफसरों ने फैसला किया कि भीड़ को शहर