7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 183

174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

तारीख को मेरी तबियत ठीक नहीं थी और मैंने कत्लेआम के बारे में कुछ

भी नहीं सुना। उसने यह स्वीकार किया कि मंजि़लगाह को खाली कराने

के बारे में उसने सुना था। बाद में अपनी गवाही में उसने माना कि उसने

गोसरजी के लोगों को खबरदार रहने के लिए कहा था, क्योंकि सक्कर में

गड़बड़ी हुई थी। आगे वह कहता है कि 19 तारीख की शाम को उसने

पंचायत बुलाई थी। कत्लेआम के बाद 21 तारीख को सूरज निकलने के

बाद गोसरजी गया था। उसने स्वीकार किया कि उसे गोसरजी का रक्षक

समझा जाता है।य्

मि. वेस्टन ने आगे लिखा किः

फ्मैं इस गवाह के साक्ष्य पर विश्वास नहीं कर सकता। मुझे इस बारे में

कोई संदेह नहीं कि उसे बीस तारीख की रात को गोसरजी में हुई गड़बड़

का पता था और वह जानबूझकर घर में ही घुसा रहा।य्ऽ

इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि दंगों का यह रिकॉर्ड परिणामों की दृष्टि से अत्यंत गंभीर चित्र प्रस्तुत करता है, ओर इससे नितांत निराशा झलकती है। पर चूंकि यह तारीखवार सिलसिले में दिया गया है इसलिए हो सकता है कि यह किसी प्रांत विशेष के दंगों की वीभत्सता की जानकारी न दे पाता हो और न ही यह बता पाता हो कि इससे किस तरह सामाजिक व आर्थिक जीवन गतिहीन हो गया। एक प्रांत में बार-बार होने वाले इन दंगों से जीवन किस तरह गतिहीन हो जाता है, इसकी जानकारी देने के लिए मैंने बंबई के दंगों का विवरण नए सिरे से लिखा है। उससे जो सामान्य चित्र उभरता है, वह इस प्रकार का है।

प्रेसीडेंसी को छोड़कर, यदि केवल बंबई शहर पर ही ध्यान दिया जाए तो इस बारे में कोई संदेह नहीं कि इस शहर का रिकॉर्ड सबसे ज्यादा खरराब है। पहला हिंदू-मुस्लिम दंगा 1893 में हुआ। इसके बाद दीर्घकाल तक अर्थात् 1929 तक सांप्रदायिक शांति बनी रही। परंतु उसके बाद के वर्षों की कहानी बड़ी भयावह है। फरवरी 1929 से अप्रैल 1938 के 9 वर्षों में दस से कम सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। 1929 में दो सांप्रदायिक दंगे हुए। पहले दंगे में 149 लोग मारे गए और 739 जख्मी हुए और ये दंगे 36 दिन तक चले। दूसरे दंगे में 35 लोग मारे गए और 109 जख्मी हुए और ये दंगे 22 दिन तक चले। 1930 में दो दंगे हुए। इनमें मारे गए लोगों की

ऽ वही, पृष्ठ 66-67