पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
179
ओर, जिस देश में जाति, भाषा और धर्म एकरूपता लाने के मार्ग में एक जोरदार बाधा पैदा करते हैं, वहां सरकार एकरूपता लाने में अधिक प्रभावी नहीं हो पाती। यदि फ्रांस, इंग्लैंड, इटली और जर्मनी के विभिन्न व्यक्ति एक ही सरकार होने के कारण एकीकृत राष्ट्र बन गए, तो इसका कारण यह था कि जाति, भाषा या धर्म किसी ने भी सरकार की एकीकरण की प्रक्रिया में बाधा नहीं डाली। दूसरी ओर, यदि ऑस्ट्रिया, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और तुर्की के लोगों का एकीकरण नहीं हो सका, हालांकि वे एक ही सरकार के अंतर्गत रह रहे थे, तो इसका कारण यह था कि वहां जाति, भाषा और धर्म इतने मजबूत थे कि वे सरकार की एकरूपता लाने की शक्ति का प्रतिरोध कर सके। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि भारत में जाति, भाषा और धर्म इतने अधिक शक्तिशाली हैं कि एक ही सरकार के अंतर्गत रहने के बावजूद भारत एकीकृत राष्ट्र के रूप में नहीं ढाला जा सकता। यह एक भ्रामक धारणा है कि हिंदुस्तान में एक केंद्रीय सरकार ने हिंदुस्तानी लोगों को एक राष्ट्र में ढाल दिया है। जो कुछ केंद्रीय सरकार ने किया है, वह यह है कि उन्हें एक ही कानून से बांध दिया है और उन्हें एक ही स्थान में बसाकर रखा है, वैसे ही जैसे बहुत से बेकाबू जानवरों का मालिक उन्हें एक ही रस्सी से बांधकर एक ही बाड़े में रखता है। केंद्रीय सरकार ने केवल इतना ही किया है कि हिंदुस्तानियों में एक प्रकार की शांति स्थापित कर रखी है। परंतु इससे वे एक राष्ट्र नहीं बन गए हैं।
यह नहीं कहा जा सकता कि एकीकरण लाने के लिए बहुत कम समय मिला है। यदि एक केंद्रीय सरकार के अंतर्गत 150 वर्ष तक रहने का समय भी पर्याप्त नहीं है तो शाश्वत काल तक रहने पर भी एकीकरण स्थापित नहीं हो पाएगा। इन असफलताओं के लिए हिंदुस्तानी लोगों की प्रकृति या उनका स्वभाव जिम्मेदार है। हिंदुस्तानियों में न तो एकता की कोई भावना है और न ही इसकी इच्छा। एक जैसी पोशाक, परिधान या पहनावा रखने की भी कोई इच्छा नहीं है। एक समान भाषा बोलने की भी कोई इच्छा नहीं है। जो कुछ अपना स्थानीय और विशिष्ट है, सर्वसाधारण और राष्ट्रीयता की खातिर उसका त्याग कोई नहीं करना चाहता। एक गुजराती को अपने गुजराती होने का गर्व है, महाराष्ट्रीयन को महाराष्ट्री होने का, पंजाबी को पंजाबी होने का, मद्रासी को मद्रासी होने का और बंगाली को बंगाली होने का गर्व है। यह उन हिंदुओं की मनोवृत्ति है, जो मुसलमानों पर यह आरोप लगाते हैं कि उनमें कोई राष्ट्रीय भावना नहीं और जो यह कहते हैं कि हम मुसलमान पहले हैं और हिंदुस्तानी बाद में। क्या कोई यह कह सकता है कि हिंदुस्तान में कहीं भी ऐसी भावना या विचार देखने को मिलता है, यहां तक कि हिंदुओं में भी, जो यह बतलाते हों कि हम सब हिंदुस्तानी एकसमान हैं, या किसी में नैतिक या सामाजिक एकता के बारे में रत्ती-भर