7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 189

180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

भी जागरूकता है या वे समानता और एकता की खातिर अपने विशिष्ट या स्थानीय हितों का त्याग कर सकते हैं? न तो ऐसी कोई जागरूकता है और न ही ऐसी कोई इच्छा। ऐसी जागरूकता या ऐसी इच्छा के अभाव में एकता लाने के लिए सरकार के भरोसे बैठे रहना स्वयं को धोखा देने के समान है।

जहां तक दूसरी बात का संबंध है, साइमन कमीशन की राय निस्संदेह इस प्रकार थीः

फ्भारत के राजनीतिक भविष्य की संभावनाओं को लेकर दोनों संप्रदायों में

उत्पन्न चिंताओं और आकांक्षाओं के उदय होने से सांप्रदायिक दंगे पनपे

हैं। सत्ता जब तक पूरी तरह ब्रिटिश हाथों में थी और स्वायत्त शासन का

विचार नहीं आया था, हिंदू-मुस्लिम प्रतिद्वंद्विता का दायरा बहुत सीमित था।

इसका कारण केवल यह नहीं था कि एक निष्पक्ष नौकरशाही व्यवस्था

होने से झगड़ों को बल नहीं मिला। इसका एक और कारण यह था कि

एक संप्रदाय को दूसरे संप्रदाय के प्रभुत्व का कोई भय नहीं था। आज

हिंदुस्तानी रियासतों में सांप्रदायिक तनाव के अपेक्षाकृत कम होने का कारण

भी यही है। वे लोग जो ब्रिटिश हिंदुस्तान की एक पीढ़ी पहले की स्थिति

से परिचित हैं, इस बात के साक्षी हैं कि उस समय दोनों संप्रदायों में इतनी

अधिक सद्भावना थी कि नागरिक शांति को सांप्रदायिक तनाव से कम

से कम खतरा था। पर सुधारों के आगमन और इस बात की संभावना से

कि इससे भविष्य में क्या मिलेगा, हिंदू-मुस्लिम प्रतिद्वंद्विता को एक नया

मुद्दा मिल गया है। स्वभावतः एक संप्रदाय अपने बहुसंख्यक होने के नाते

तथा अधिक शिक्षित व समृद्ध होने के कारण अपने अधिकारों का दावा

करता है, जबकि दूसरा इन्हीं कारणों से अपने संप्रदाय के संरक्षण की और

अधिक जोर-शोर से बात उठाता है, और वह कभी यह नहीं भूलता कि

वह इस देश के विगत विजेता का प्रतिनिधि है। वह चाहता है कि उसे

पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले और सरकारी नौकरियों में पूरा हिस्सा मिले।य्

यदि यह मान लिया जाए कि यह सही निदान है, यदि यह मान लिया जाए कि मुसलमानों की मांगें उचित हैं और यदि यह मान लिया जाए कि हिंदू इन मांगों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, यद्यपि ये तीनों बहुत बड़ी परिकल्पनाएं हैं - तो भी प्रश्न यह उठता है कि क्या मुस्लिमों की राजनीतिक मांगें पूरी होने से, राजनीतिक एकता हो जाने से, हिंदू-मुस्लिमों में सच्ची एकता पैदा हो जाएगी? कुछ लोगों का यह विचार है कि यदि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच राजनीतिक एकता स्थापित हो गई तो यही पर्याप्त है। परंतु मेरे विचार में यह सबसे अधिक भ्रामक बात है। जो