पाकिस्तान का हिंदू विकल्प
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लोग इस विचार के हामी हैं, वे केवल यह सोचते हैं कि किसी भी तरह अंग्रेजों से औपनिवेशिक स्वराज या पूर्ण स्वराज की मांग करते समय मुसलमानों को अपने साथ मिला लेना चाहिए। परंतु यह तो बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण है। अंग्रेजों से मांग करते समय मुस्लिम हिंदुओं के साथ मिल जाएं, यह तो अपेक्षाकृत एक बहुत ही छोटा प्रश्न है। वे किस भावना से संविधान पर काम करेंगे? क्या वे ऐसे दो अनजान व्यक्तियों की भांति काम करेंगे, जिन्हें अनिच्छापूर्वक एक साथ बांध दिया गया है या वे सच्चे बंधुत्व की भावना से काम करेंगे? अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि उन्हें सच्ची बंधुत्व भावना से काम करना है, तो उसके लिए केवल राजनीतिक एकता की जरूरत नहीं है, बल्कि जरूरत है हृदय व आत्मा के सच्चे मिलन की या दूसरे शब्दों में सामाजिक एकता की। राजनीतिक एकता का तब तक कोई अर्थ नहीं, जब तक इसमें वास्तविक एकता अंतर्विष्ट न हो। अन्यथा, यह उसी एकता की तरह नाजुक है जैसे कुछ व्यक्ति बिना मैत्री के एक-दूसरे के साथी बन जाते हैं। यह कितना नाजुक होता है, इसका सर्वोत्तम उदाहरण है कि जर्मनी और रूस के बीच क्या हुआ। व्यक्तिगत रूप से मैं यह नहीं मानता कि केवल भौतिक हितों की संतोषजनक ढंग से पूर्ति करके स्थाई एकता हो सकती है। समझौतों या पैक्ट से एकता तो स्थापित हो सकती है, परंतु वह एकता कभी यथार्थ एकता में नहीं बदल सकती। किसी पैक्ट को एकता का आधार बनाना तो निरर्थक से भी निकृष्ट बात है। समझौते या पैक्ट में अलगाव की भावना होती है। समझौते में एक दूसरे की बात मानने की इच्छा पैदा नहीं होती, इससे अपना स्वार्थ त्यागने की भावना पैदा नहीं होती और न ही यह विभिन्न दलों को मुख्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक साथ बांध सकता है। पैक्ट में शामिल पार्टियां एक दूसरे के विचारों को मानने की जगह एक दूसरे से अधिकाधिक हथियाना चाहती हैं। अपने सांझे हित के लिए त्याग करने की जगह पैक्ट में शामिल पार्टियां इसी बात को देखती रहती हैं कि एक पार्टी द्वारा किए गए त्याग से कहीं दूसरी पार्टी लाभ न उठा ले। अपने मुख्य लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करने के बजाए पार्टियों का ध्यान सदा इस बात की ओर लगा रहता है कि लक्ष्य प्राप्ति के इस संघर्ष के कारण इन पार्टियों का सत्ता-संतुलन कहीं डगमगा न जाए। रेनन का यह कथन बहुत सच हैः
फ्समान हित निश्चय ही मनुष्यों को एक साथ रखने के शक्तिशाली बंधन
होते हैं। परंतु क्या ये हित किसी कौम या राष्ट्र का निर्माण करने के लिए
काफी हैं? मुझे इस बात पर कतई विश्वास नहीं है। समान हितों के कारण
व्यापारिक संधियां की जाती हैं। परंतु राष्ट्रीयता के पीछे एक भावनात्मक पहलू
होता हैः यह शरीर भी होता है और आत्मा भी।य्