7. पाकिस्तान का हिंदू विकल्प - Page 191

182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

ऐसा ही उल्लेखनीय मत प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता जेम्स ब्राइस का है। उनके अनुसारः

फ्किसी संस्था की स्थिरता केवल भौतिक समान हितों पर निर्भर नहीं करती

जो उसे साधे रहते हैं, बल्कि यह उन मनुष्यों में गहरी जमी भावनाओं पर

निर्भर करती है जिनके लिए यह संस्था बनाई गई है। जब यह संस्था उस

भावना की पूर्ण अभिव्यक्ति करती है तो वह भावना न केवल मुखरित हो

उठती है, बल्कि वास्तव में अधिक मजबूत हो जाती है और इससे वह

संस्था और भी अधिक शक्तिशाली हो जाती है।य्

ब्राइस ने यह टिप्पणियां बिस्मार्क द्वारा जर्मन साम्राज्य की नींव डालने के संदर्भ में की थीं। ब्राइस के अनुसार, बिस्मार्क एक स्थाई साम्राज्य की स्थापना करने में इसलिए सफल हुआ क्योंकि वह एक भावना पर आधारित था और इस भावना को प्रोत्साहन देकर उसका पोषण किया गयाः

फ्राष्ट्रीयता के लिए सहजवृत्ति या मनोभाव ऐसे लोगों की इच्छा बताते हैं

जो पहले से ही एक नैतिक और सामाजिक एकता के प्रति जागरूक हैं, जो

यह चाहते हैं कि इस एकता को एक ही सरकार के अंतर्गत अभिव्यक्ति

मिले उसे सभ्य देशों की श्रेणी में स्थान और नाम दिलाए।य्

ऐसी नैतिक और सामाजिक एकता जो स्थायित्व प्रदान करती हैं, कैसे प्राप्त की जा सकती है? और ऐसी क्या विशेषता है जिससे ऐसी एकता को अभिव्यक्ति मिले और एक ही सरकार के अंतर्गत उसे प्राप्त किया जाए, जिसके कारण उसे सभ्य देशों में स्थान और नाम मिल सके?

इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए जेम्स ब्राइस से अधिक योग्य व्यक्ति दूसरा नहीं हो सकता। ऐसा ही प्रश्न था जिस पर रोमन साम्राज्य की बनाम पवित्र रोमन साम्राज्य की जीवन-क्षमता के बारे में ब्राइस को विचार करना पड़ा था। यदि कोई साम्राज्य अपनी भिन्न-भिन्न विचारों वाली प्रजा में राजनीतिक एकता स्थापित करने में सफल हुआ था, तो वह था रोमन साम्राज्य। ब्राइस के शब्दों में संक्षेप में कहा जाए तो रोम की नागरिकता का क्रमिक विस्तार करने के लिए उपनिवेशों की स्थापना की गई। पहले समूचे इटली में और फिर प्रांतों में समानता वोल और समानता लाने वाले रोमन कानून पर अमल करने से सारे प्रजाजनों पर एक से सरकारी दबाव से तथा वाणिज्य और गुलामों के व्यापार के फलस्वरूप हुए आवागमन से भिन्न-भिन्न लोग बराबर आपस में घुलते-मिलतें गए। सम्राटों ने, जो मुख्यतः प्रांतों के रहने वाले थे, इटली की कोई विशेष चिंता नहीं की और यहां तक कि एन्टोनाइंस के दिनों बाद भी रोम से