HI/Volume_15 - Page 20

11

अध्यायः 2
एक राष्ट्र का अपने घर के लिए आह्वान
I

पृथकता की इन मांगों के पीछे कुछ ऐसे प्रमुख प्रशासनिक, भाषायी अथवा सांस्कृतिक तथ्य हैं, जो सभी को मान्य और स्वीकार्य हैं। इन मांगों के बारे में किसी को भी आपत्ति नहीं और हर कोई उन्हें मान लेने को तैयार है परन्तु हिन्दू कहते हैं। कि मुसलमान पृथकता के मुद्दों से भी आगे जा रहे हैं और सवाल उठाते हैं कि वे यह मार्ग क्यों अपना रहे हैं, विभाजन क्यों मांग रहे हैं और सांझे बंधन को तोड़ने के लिए पाकिस्तान और हिंदुस्तान के कानूनी अलगाव अथवा विभाजन जैसी मांग क्यों कर रहे हैं?

इसका जवाब मुस्लिम लीग द्वारा अपने प्रस्ताव में की गई घोषणा में खोजना होगा, जिसमें कहा गया है कि मुसलमान एक पृथक राष्ट्र हैं। मुस्लिम लीग की इसी घोषणा का हिंदुओं ने प्रतिरोध किया है और इसे उपहासारपद बताया है।

हिन्दुओं का आक्रोश स्वाभाविक ही है। भारत एक राष्ट्र है या नहीं, यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना होने के साथ ही एंग्लो-इंडिया (आंग्ल-भारतीयों) और हिंदू राजनीतिज्ञों के बीच विवाद का विषय रहा है। एंग्लो-इंडियन यह जताते हुए कभी नहीं अघाए कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, ‘भारतीय’ तो भारत के लोगों के लिए एक अन्य संज्ञा मात्र ही है। एक एंग्लो-इंडियन के शब्दों में भारत को जानने के लिए यह भूलना होगा कि भारत जैसी कोई चीज है। दूसरी ओर, हिंदू राजनीतिज्ञ और देशभक्त इस बात पर समान रूप से जोर देते रहे हैं कि भारत एक राष्ट्र है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि एंग्लो-इंडियन के कथन में सार्थकता है। यहां तक कि बंगाल के राष्ट्रीय कवि डॉक्टर टैगोर भी उनसे सहमत हैं। परंतु इस मुद्दे पर हिंदू कभी डॉ. टैगोर के समक्ष भी नहीं झुके। इसके दो कारण हैं। प्रथमतः-हिंदू यह स्वीकार करने में लज्जा महसूस करते हैं कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। ऐसे विश्व में, जिसमें लोगों में राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद विशेष वरदान के रूप में मान्य हैं हिंदुओं के