12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
लिए यह महसूस करना स्वाभाविक है, जिसे एस.जी. वेल्स के शब्दों में यह कहा जा सकता है कि भारत के लिए राष्ट्रीयता के बिना होना उतना ही अनुचित होगा जितना कि किसी आदमी का भीड़ में निर्वस्त्र होना। दूसरे यह कि उन्होंने यह महसूस किया था कि राष्ट्रीयता का स्वराज्य के दावे से गहन संबंध है। वह जानते थे कि उन्नीसवीं सदी के अंत तक यह एक मान्य सिद्धांत हो गया था कि जो लोग एक राष्ट्र के रूप में रहते हैं, वे स्वशासन के अधिकारी हैं और यदि कोई भी देशभक्त जो अपनी जनता के लिए स्वशासन की मांग करता है, उसे यह सिद्ध करना होगा कि वह जनता एक राष्ट्र है। इन कारणों से हिंदू ने यह जांचना कभी नहीं छोड़ा कि क्या भारत वास्तव में एक राष्ट्र रहा है या नहीं। उसने इस बारे में कभी विचार किया कि क्या राष्ट्रीयता महज लोगों को राष्ट्र कह देने का सवाल अथवा वास्तव में राष्ट्र होने का सवाल भी है। वह एक बात जानता है कि यदि उसे भारत के लिए स्वशासन की अपनी मांग से सफलता पानी है, तो उसे इस बात पर कायम रहना होगा कि भारत एक राष्ट्र है, भले ही वह इसे सिद्ध न कर सके।
उसके इस दावे का किसी भारतीय ने कभी खंडन नहीं किया। यह दावा इतना ग्राह्य रहा कि भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता भी उसके समर्थन में प्रचारात्मक साहित्य की रचना करते रहे, निस्संदेह देशभक्ति की भावना से हिंदू समाज-सुधारक जो यह जानते थे कि यह एक घातक विभ्रम है, खुलकर इस दावे का खंडन नहीं कर सके, क्योंकि जो कोई भी इस पर सवाल करता, उसे तत्काल ब्रिटिश नौकरशाही के पिट्ठू और देश के शत्रु की संज्ञा दी जाती थी। हिंदू राजनीतिज्ञ एक लंबे अरसे तक अपने दृष्टिकोण का प्रचार करता रहा। उसके विरोधी एंग्लो-इंडियनों ने उसका जवाब देना बंद कर दिया। उसका प्रचार प्रायः सफल हो रहा था। जब यह सफलता के सन्निकट था, तभी मुस्लिम लीग की यह घोषणा सामने आई जिसने इसमें व्यवधान डाला। यह स्वर क्योंकि एंग्लो-इंडियनों की ओर से नहीं गूंजा, अतएव एक भीषण प्रहार है। हिंदू राजनीतिज्ञों ने वर्षों में जो काम किया था, यह उसे ही तबाह करता है। यदि भारत में मुसलमान एक अलग राष्ट्र हैं, तो भारत निश्चय ही एक राष्ट्र नहीं है। यह कल्पना हिंदू राजनीतिज्ञों के पैरों तले की जमीन ही खिसका देती है। यह स्वाभाविक ही है कि वे क्षोभ का अनुभव करें और इसे पीठ में छुरा घोंपे जाने की संज्ञा दें।
छुरा घोंपा गया हो या नहीं, मुद्दा तो यह है कि क्या यह कहा जा सकता है कि मुसलमानों का कोई राष्ट्र है? अन्य बातों का इस मुद्दे से कोई संबंध नहीं है। इससे सवाल उठता है राष्ट्र क्या है? इस विषय में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। जो जिज्ञासु हैं, वे उसे पढ़ सकते हैं और विभिन्न बुनियादी अवधारणाओं तथा विभिन्न पक्षों का अध्ययन कर सकते हैं। मगर यह जानना पर्याप्त होगा कि विषय का सार-तत्व क्या है और इसे कुछ शब्दों में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। राष्ट्रीयता एक सामाजिक