192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
- प्रांतों और केंद्र की सरकारें पूरी तरह राष्ट्रीय सरकारें होनी चाहिएं और
उनमें सैनिक मनोवृत्ति के व्यक्तित्व होने चाहिएं। केंद्रीय और सभी प्रांतीय
मंत्रिमंडलों में हिंदू और मुस्लिम बराबर संख्या में होने चाहिएं। जहां आवश्यक
हो, महत्वपूर्ण अल्पसंख्यकों को विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाए। संयुक्त
निर्वाचक-मंडल के माध्यम से यह योजना बहुत संतोषजनक ढंग से काम
करेगी। परंतु देश की वर्तमान परिस्थिति में पृथक निर्वाचक-मंडल जारी
रहने चाहिएं। हिंदू मंत्री विधान के हिंदू सदस्यों द्वारा चुने जाने चाहिएं और
मुस्लिम मंत्री सदस्यों द्वारा।
- मंत्रिमंडल तभी बर्खास्त किया जा सकता है जब पूरे मंत्रिमंडल के विरुद्ध
अविश्वास प्रस्ताव लाया जाए और वह समूचे सदन के दो-तिहाई बहुमत
से पारित हो। इसमें हिंदुओं और मुस्लिमों का अलग-अलग बहुमत हो।
- प्रत्येक संप्रदाय के धर्म, भाषा, लिपि और व्यक्तिगत कानून की सर्वोच्च
संवैधानिक नियंत्रण द्वारा सुरक्षा की जानी चाहिए, जिससे प्रत्येक संप्रदाय का
प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों के बहुमत को यह अधिकार हासिल हो कि
वे किसी भी ऐसे कानून या अन्य कदम को वीटो कर सकें जो उपरोक्त
स्थिति पर प्रभाव डालता हो। इसी तरह संप्रदाय के आर्थिक कल्याण-कार्यों
पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले किसी भी कदम या उपाय पर ऐसा ही
वीटो करने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।
- प्रशासन में समुचित प्रतिनिधित्व देने के लिए नौकरियों में सांप्रदायिक
अनुपात को एक व्यावहारिक उपाय के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए
और संरक्षण देते समय भी इसका ध्यान रखा जाना चिहए।
यदि हैदराबाद रियासत की नेशनल पार्टी का एक मुस्लिम नेता ऐसा प्रस्ताव देता है, तो इससे यह संकेत मिलता है कि ब्रिटिश हिंदुस्तान में रहने वाले मुसलमानों का दिमाग किस दिशा में चल रहा है। इसलिए मैंने पाकिस्तान के विकल्प के बारे में जो अनुमान लगाया है, उसे और अधिक समर्थन मिल जाता है।
II
यह सच है कि ‘आजाद मुस्लिम सम्मेलन’ के भारी-भरकम नाम से अप्रैल 1940 में दिल्ली में एक मुस्लिम सम्मेलन बड़ी धूमधाम से हुआ था। इस आजाद सम्मेलन में जो मुस्लिम शामिल हुए थे, वे मुस्लिम लीग और नेशनलिस्ट मुसलमानों दोनों के