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विदेशों से सीख

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और साहस गंवा दिया जिससे आटोमेंस ने अपने प्रारंभिक काल में अनेक युद्ध जीते थे। यह सेना के स्वरूप के कारण हुआ था, जिसमें सैनिकों की भर्ती केवल तुर्कों और अरबों तक सीमित कर दी गई थी। साथ ही लूट के अवसर, और उस लूट को सेना में बांटने की आशा भी घटी थी जो पहले उन्हें लड़ने के लिए प्रेरित करती थी। यह स्थिति बाद की उस अवधि में भी बनी रही थी, जब साम्राज्य रक्षात्मक रुख अपना रहा था और नई विजयों का सवाल ही नहीं रह गया था, अपितु जो कुछ जीता था, उसे कायम रखना ही उद्देश्य बन चुका था।

तुर्की के पतन के बाह्य कारणों में मुख्य कारण यूरोपीय राष्ट्रों में लूटमार करने की प्रवृत्ति का उभरना बताया जाता है। परंतु इस दृष्टिकोण से एक वास्तविक कारण लुप्त हा जाता है। तुर्की के पतन का वास्तविक और प्रमुख कारण उसके प्रजाजनों में राष्ट्रीयता की भावना की अभिवृत्ति था। ग्रीक-विद्रोह, सर्बों का विद्रोह, बलगारियनों और अन्य बाल्कनों का तुर्क अधिसत्ता के विरुद्ध विद्रोह स्पष्ट रूप से ईसाई धर्म और इस्लाम के बीच टकराव के परिचायक थे। परन्तु यह केवल सतही तौर पर दिखने वाला कारण था। ये विद्रोह तो उस राष्ट्रवाद की भावना की अभिव्यक्ति था जिससे वे उत्प्रेरित थे। इन विद्रोहों का तात्कालिक कारण तुर्की का कुशासन, इस्लाम के प्रति ईसाई धर्म का विरोध-भाव और यूरोपीय राष्ट्रों का षड्यंत्र भी था। किंतु इनसे वास्तविक प्रेरक शक्ति का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता। वास्तविक प्रेरक शक्ति तो राष्ट्रवाद की भावना ही थी, और उनका विद्रोह तो उनकी उस आकांक्षा की अभिव्यक्ति मात्र था, जिसका उनमें स्फुरण हुआ था। तथ्य यह है कि राष्ट्रीयता की भावना के कारण ही तुर्की का पतन हुआ। यह विगत युद्ध में अरबों के विद्रोह और स्वतंत्र होने की उनकी इच्छा से सिद्ध हो जाता है। इस मामले में न तो इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच टकराव जैसी स्थिति थी और न ही दोनों के बीच शोषक और शोषित जैसी ही कोई भावना या संबंध था। इस पर भी अरब ने तुर्की साम्राज्य से स्वतंत्र होने का दावा किया। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि अरब तुर्की प्रजाजन बने रहने के बजाए अरब राष्ट्रीयता से प्रेरित था और उसने अरब राष्ट्रवादी होना ही श्रेयस्कर माना।

चेकोस्लोवाकिया के विनाश के क्या कारण हैं?

सामान्य धारणा यह है कि यह जर्मन आक्रमण का परिणाम था। एक हद तक यह सच भी है। परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। यदि जर्मनी ही चेकोस्लोवाकिया का एकमात्र शत्रु था तो उसे कुछ मिलाकर अपने उस सीमावर्ती क्षेत्र के एक छोटे-से भाग को ही गंवाना पड़ता, जिसमें सूडटन जर्मन बसे हुए थे। जर्मनी के आक्रमण का उस पर इससे ज्यादा कोई प्रभाव नहीं हो सकता था। वस्तुतः चेकोस्लोवाकिया का