204 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
विध्वंस उसकी सीमाओं में ही स्थित एक शत्रु ने किया था। वह शत्रु था स्लोवाकों का दुराग्रही और कट्टठ्ठर राष्ट्रवाद, जो राज्य की एकता को भंग कर स्लोवाकिया की स्वतंत्रता चाहते थे।
स्लोवाकों का चेकों के साथ एक ही राज्य की दो इकाइयों के रूप में मिलन कतिपय मान्यताओं पर आधारित था। पहली यह थी कि दोनों को एक दूसरे से इतना अधिक अभिन्न माना जाता था कि वे एक ही राष्ट्रिक प्रतीत होते थे। दूसरे स्लोवाक चेकोस्लोवाक की एक शाखा मात्र ही है। दोनों एक ही चेकोस्लोवाक भाषा-भाषी हैं। तीसरा यह कि कोई अलग स्लोवाक राष्ट्रीय चेतना नहीं है। उस समय किसी ने भी इन धारणाओं की समीक्षा नहीं की, क्योंकि स्लोवाक स्वयं इस संघ के इच्छुक थे। उन्होंने शांति सम्मेलन में अपने प्रतिनिधियों द्वारा 1918 में की गई औपचारिक घोषणा द्वारा अपनी यह इच्छा व्यक्त की थी। यह उस मामले में बरती गई जल्दबाजी और सतही दृष्टिकोण था। जैसा कि प्रोफेसर मेकार्टनी ने इंगित किया हैः
फ्............मुख्य राजनीतिक तथ्य, जो वर्तमान युग के प्रयोजनों के लिए इस
इतिहास (चेकों और स्लोवाकों के बीच संबंधों का) पर विचार करने के
कारण उभर कर सामने आता है, उससे सलोवाक राष्ट्रीय चेतना अन्तिम
रूप से स्पष्ट होती है............ कम से कम स्लोवाकिया में एक एकल
अविभाज्य चेकोस्लोवाक भाषा में वास्तविक और अडिग आस्था रखने वालों
की संख्या कभी भी उतनी अधिक नहीं थी, जितनी कि दर्शायी जाती थी।
आज वे घटकर मुट्टòी-भर ही रह गए हैं, जो चेकों और स्लोवाकों के बीच
व्याप्त मतभेदों से प्रभावित हैं। आज तो स्वयं चेकों ने स्लोवाक भाषा को
स्लोवाकिया की सरकारी भाषा के रूप में स्वीकार किया है। राजनीतिक
और राष्ट्रीय प्रतिरोध भी कम सुदृढ़ नहीं है और आज चेकोस्लोवाकिया नाम
वस्तुतः सरकारी दस्तावेज़ों और विदेशियों के लाभार्थ प्रसारित साहित्य तक
ही सीमित रह गया है। देश में कई सप्ताह तक रहने के दौरान मुझे केवल
एक व्यक्ति द्वारा इस नाम का अपने लिए उपयोग करते सुनने की याद है।
वह एक अर्ध जर्मन, अर्ध हंगेरियन युवती थी, जो इसे विशुद्ध राजनीतिक
दृष्टि से इस्तेमाल करती थी, जिसका तात्पर्य यह था वह ‘इरिडेंटिज्म’ को
निरर्थक समझती थी। जब कोई भी चेक अथवा स्लोवाक स्वाभाविक तौर
पर किसी से बातचीत करता है, तो वह जो भी है उसी के अनुरूप स्वयं
को चेक या स्लोवाक बताता है।ऽ
ऽ सी.ए. मेकार्टनी, ‘हंगरी एंड हर सक्सेसर्स’, (ऑक्सफोर्ड), पृ. 136