विदेशों से सीख
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स्लोवाकों की यह राष्ट्रीय चेतना, जो सदैव जीवंत थी, यह देखकर विस्फोटक होनी शुरू हो गई कि सुडेटन जर्मनों ने चेकोस्लोवाकिया से स्वायत्त शासन की मांग की है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में डाकूज़नी का सिद्धांत अपनाते हुए, जर्मनों ने कहा कि जो कुछ हम मांग रहे हैं वह हमें दे दो, अन्यथा हम तुम्हें तबाह कर देंगे। इस प्रकार की चालबाज़ी का इस्तेमाल करके वे अपने उद्देश्य की सिद्धि करना चाहते थे। स्लोवाकों ने भी यही मार्ग अपनाया और स्वायत्तता के लिए अपनी मांगे रखीं, परंतु उन्होंने कुछ अलग तरीका अपनाया। उन्होंने लुटेरे समुदाय की पद्धति का अनुसरण नहीं किया, बल्कि अपनी मांगों को मात्र स्वायत्तता तक सीमित कर दिया। उन्होंने स्वतंत्रता के समग्र विचार को तो दूर रखा और स्लोवाकिया में स्वायत्त आंदोलन में अग्रगण्य व्यक्ति डॉ. रिसो ने 8 अक्टूबर को जारी अपनी उद्घोषणा में कहाः हम प्रभु एवं राष्ट्र के लिए, अपने ध्येय की उपलब्धि के लिए, ईसाई एवं राष्ट्रीय भावना से ओतप्रेत होकर, अपने स्वायत्त शासन की मांग के लिए आगे बढ़ेंगे। उक्त सत्यता में विश्वास करते हुए और उस ग्रावामिन पोलिटिक के लिए गुंजाइश न रहने देने की कोई अभिलाषा रखे बिना, जिसका कि स्लोवाक चेकों और स्लोवाकों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों में विघ्न डालने के लिए पूरा-पूरा उपयोग कर रहे थे, म्युनिख पैक्ट के तत्काल बाद प्राग की राष्ट्रीय असेंबली में (नवंबर 1938) उन्होंने एक अधिनियम पारित कर दिया और उसे स्लोवाकिया के स्वायत्तता संबंधी संवैधानिक अधिनियम की संज्ञा दी गई। उस अधिनियम के प्रावधानों का स्वरूप अत्यंत दूरगामी था। उसके तहत स्लोवाकिया के लिए एक पृथक संसद होगी ओर यह संसद ही चेकोस्लोवाक गणराज्य की कानूनी प्रणाली के ढांचे के तहत स्लोवाकिया संविधान का निर्णय करेगी। स्लोवाकिया के क्षेत्र में बदलाव स्लोवाक संसद के दो-तिहाई बहुमत की सहमति से होगा। स्लोवाक संसद की सहमति स्लोवाकिया से पूर्णतया संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संधियों के लिए भी आवश्यक कर दी गई। स्लोवाकिया में केंद्रीय राज्य प्रशासन के अधिकारी भी बुनियादी तौर पर स्लोवाक ही होंगे। सभी केंद्रीय संस्थानों, परिषदों, आयोगों और अन्य संगठनों से स्लोवाकिया के समानुपातिक प्रतिनिधित्व की गारंटी दी गई थी। इसी तरह ऐसे सभी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भी स्लोवाकिया को समानुपातिक प्रतिनिधित्व दिया गया, जिनमें योगदान के लिए चेकोस्लोवाकिया को आमंत्रित किया जाए। शांतिकाल में स्लोवाक सैनिक यथासंभव स्लोवाकिया में ही तैनात किए जाएंगे। जहां तक विधायी प्राधिकारों का संबंध है, सामान्य हित के सभी विषय चेकोस्लेवाकिया संसद को सौंपे गए थे। स्लोवाक को इन अधिकारों की गारंटी देते हुए संविधान अधिनियम में यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय असेंबली द्वारा किए गए संवैधानिक परिवर्तन तभी वैध होंगे, जब ऐसे परिवर्तनों के पक्ष में अपेक्षित संवैधानिक बहुमत होगा। इसमें स्लोवाकिया