विदेशों से सीख
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दिया। अगले दिन टिसो ने, जिनके बारे में अनुमान लगाया गया था कि वह पुलिस निगरानी में हैं, बर्लिन को टेलीफोन कर सहायता का अनुरोध किया। सोमवार को टिसो और हिटलर में भेंट हुई और डेढ़ घंटे तक बर्लिन में वार्ता चलती रही। हिटलर के साथ हुई इस बातचीत के तुरंत बाद टिसो ने प्राग फोन किया और जर्मन आदेशों की जानकारी दे दी।
वे आदेश ये थेः
सभी चेक सैनिक स्लोवाकिया से हटाए जाएं।
स्लोवाकिया जर्मन संरक्षण में एक स्वतंत्र राज्य होगा।
राष्ट्रपति हाचे द्वारा स्वाधीनता की उद्घोषणा सुनने के लिए स्लोवाक संसद
बुलाई जाएगी।
राष्ट्रपति हाचे और प्राग सरकार के पास ‘हां’ कहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहा, क्योंकि उन्हें भली-भांति विदित था कि जर्मन सेना के कई दर्जन डिवीजन चेकोस्लोवाकिया की रक्षाविहीन सीमाओं के चारों ओर एकत्रित हो चुके हैं, और यदि स्लोवाकिया के हितों में जर्मनी द्वारा की गई मांगों को मानने से इन्कार कर दिया गया तो जर्मनी की सेनाएं किसी भी क्षण अंदर दाखिल हो जाएंगी। इस तरह चेकोस्लोवाकिया के नए राज्य का अंत हो गया।
IV
इन दो देशों की कहानी से क्या शिक्षा ग्रहण की जा सकती है?
मामलों को कैसे पेश किया जाए इसे लेकर कुछ मतभेद हो सकता है। श्री सिडनी बुक्स कहेंगे कि इन विनाशकारी युद्धों का कारण राष्ट्रीयता की भावना है, जो उनके अनुसार विश्वशांति का दुश्मन है। दूसरी ओर, श्री नोर्मन एंजल कहेंगे कि राष्ट्रीयता की भावना नहीं, अपितु राष्ट्रीयता के लिए उत्पन्न खतरा ही इसका कारण है। श्री रॉबर्ट्सन के विचार में राष्ट्रीयता एक अयुक्तिसंगत अंतःप्रेरणा है। भले ही वह सकारात्मक मतिभ्रम न हो पर जितना शीघ्र मानवता इससे छुटकारा पाए, उतना ही सबके लिए बेहतर होगा।
मामले को चाहे किसी भी तरह पेश क्यों न किया जाए और राष्ट्रीयता के उन्मूलन के प्रति चाहे जितनी ही प्रबल आकांक्षा क्यों न हो, जो शिक्षा ग्रहण की जा सकती है, वह बेहद साफ है कि राष्ट्रीयता एक वास्तविकता है, जिससे न तो कुशलतापूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है और न ही उसका निषेध किया जा सकता है। चाहे कोई इसे अयुक्तिसंगत अंतःप्रेरणा कहे या सकारात्मक मतिभ्रम बताए, परंतु यह तथ्य है कि