208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
यह एक प्रभावपूर्ण शक्ति है और ऐसी गतिशील ताकत है जो साम्राज्यों को खंडित कर सकती है। इसका कारण चाहे राष्ट्रीयता हो अथवा राष्ट्रीयता के लिए खतरा, यह तो कहने का ढंग है। वास्तविकता तो उसे मान्यता देने की ही है जैसाकि श्री टोयनबी ने भी कहा है फ्हमारे न चाहने के बावजूद राष्ट्रीयता युद्ध की वजह बनने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली हैं। उसने भयावह रूप से यह सिद्ध कर दिखाया है कि वह कोई दुर्बल-सा अपवाद नहीं, अपितु एक दुर्दम्य एवं निर्णायक शक्ति है।य् जैसा कि उन्होंने इंगित किया फ्राष्ट्रीयता का सही-सही अध्ययन जीवन-मरण का प्रश्न बन गया है।य् यह स्थिति केवल यूरोप में ही नहीं थी। तुर्की में भी ऐसा ही था। चेकोस्लोवाकिया में भी यही था। और उनके लिए तो यह जीवन-मरण का प्रश्न था, भारत के लिए भी वही जीवन-मरण का प्रश्न बन सकता है। प्रो. टोयनबी ने ग्यूजोट की भांति इस बात पर बल दिया है कि यूरोपीय शांति के लिए राष्ट्रीयता को आवश्यक आधारशिला के रूप में मान्यता दी जाए। क्या भारत इस दलील की उपेक्षा कर सकता है? यदि वह ऐसा करेगा तो भयावह आपदा को आमंत्रित करेगा। इन दोनों देशों के इतिहास से जो सीख ली जा सकती है, वह मात्र यही नहीं है कि राष्ट्रीयता एक विध्वंसक शक्ति है। उनके अनुभव अधिक नहीं, तो समान रूप से महत्वपूर्ण तो हैं ही। यदि कतिपय तथ्यों को याद रखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा।
तुर्क किसी भी लिहाज से उतने अनुदार नहीं थे जैसा कि उन्हें दर्शाया जाता है। उन्होंने अपने वहां अल्पसंख्यकों को बड़ी हद तक स्वायत्तता प्रदान की थी। तुर्कों ने इस समस्या का समाधान खोजने के लिए बहुत प्रयास किया था कि विभिन्न सामाजिक विरासतों वाले अनेक समुदायों के लोग, जो भौगोलिक दृष्टि से अंतर्मिश्रित हैं, एक दूसरे के साथ सौहार्दपूर्वक कैसे रहें। ओटोमन साम्राज्य ने अपने देश में रहने वाले गैर-मुस्लिमों और गैर-तुर्क समुदायों के लोगों को एक सीमा तक वस्तुतः ऐसी क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक स्वायत्तता भी प्रदान की हुई थी, जिसकी पश्चिमी राजनीतिक दर्शन में कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। क्या इससे ईसाई प्रजाजनों की किंचित भी संतुष्टि हो पाई थी? कोई चाहे जो कहे, ईसाई अल्पसंख्यकों का राष्ट्रवाद इस स्थानीय स्वायत्तता से संतुष्ट नहीं हो सकता था। उसने पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था और उस संघर्ष में तुर्की विखंडित हो गया था।
तुर्क धार्मिक सूत्र द्वारा अरबों से जुड़े हुए थे। मानव-समाज में इस्लाम के धार्मिक बंधन को सर्वाधिक सुदृढ़ माना जाता है। सामाजिक एकता के मुद्दे के लिहाज से इस्लामी भाईचारे का मुकाबला करने का दावा अन्य कोई भी सामाजिक संघ नहीं कर सकता। इस तथ्य के साथ एक बात और भी जुड़ी है कि जहां तुर्क अपनी ईसाई प्रजा को अपने से हीन मानते थे, वहीं अरबों को अपने बराबर मानते थे। ओटोमन