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विदेशों से सीख

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सेना में गैर-मुस्लिम की भर्ती नहीं होती थी, पर अरब सैनिक व अधिकारी, तुर्क और कुर्द सैनिक और अधिकारी साथ-साथ काम करते थे। तुर्की स्कूल में शिक्षा प्राप्त अरब अधिकारी वर्ग सेना और नागरिक पदों पर उन्हीं शर्तों पर काम करते थे, जिन पर तुर्क काम करते थे। तुर्कों और अरबों के बीच सेवाओं में अरबों के उच्चतम पद पर आसीन होने के मार्ग में भी कोई बाधा नहीं थी। राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी अरब और तुर्क आपस में एक-दूसरे को बराबर मानकर चलते थे। अरब तुर्क स्त्री से और तुर्क अरब स्त्री से विवाह करते थे। क्या भ्रातृत्व, स्वतंत्रता और समानता पर आधारित अरबों और तुर्कों के बीच इस्लामिक भाईचारे से अरबों को संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए था? कोई भी कहे, अरब इससे संतुष्ट नहीं थे। अरब राष्ट्रवाद ने इस्लाम के इस बंधन को तोड़ दिया और वह अपने ही मुस्लिम बंधुओं से, जो तुर्क थे, अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने से नहीं चुके। उसे विजय मिली, परंतु तुर्की पूर्णतः खंडित हो गया।

जहां तक चेकोस्लोवाकिया की बात है, चेकों और स्लोवाकों को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देते हुए यह अस्तित्व में आया। कुछ ही वर्षों में स्लोवाकों ने स्वयं को एक पृथक राष्ट्र होने का दावा जताया। उन्होंने यह भी स्वीकार नहीं किया कि वे चकों के समान एक ही मूल की शाखा हैं। उनके राष्ट्रवाद ने चेकों को यह तथ्य स्वीकार करने पर बाध्य कर दिया कि वे एक अलग जन-समुदाय हैं। चेकों ने स्लोवाकों के राष्ट्रवाद को संतुष्ट करने के लिए उनकी विशिष्टता दर्शाने वाले एक चिह्न के तौर पर विभेदात्मक रेखा भी खींच दी। चेकोस्लोवाकिया के बजाए वे चेको स्लोवाकिया पर भी समत हो गए। परंतु इस विभेदात्मक रेखा के बावजूद स्लोवाक राष्ट्रवाद संतुष्ट नहीं हुआ। स्वायत्तता की कार्य-प्रणाली स्लोवाकों को चेकों से पृथक रखने और उन्हें साथ ही चेकों से जोड़ने वाली रेखा के रूप में अपनाई गई थी। पृथकतासूचक इस रेखा का स्लोवाकों ने स्वागत किया, परंतु चेकों के साथ उसके मिलन-चिह्न होने से वे खिन्न भी थे। स्लोवाकों ने इस विभेदात्मक रेखा के साथ स्वायत्तता का स्वागत किया और संतोष व्यक्त करते हुए राज्य के प्रति निष्ठावान रहने का आश्वासन भी दे दिया। किंतु यह स्पष्टतः एक रणनीतिक मामला ही था। उन्होंने इसे अपने अंतिम लक्ष्य की सिद्धि नहीं माना। दरअसल उन्होंने इसे यह सोचकर स्वीकार किया था कि योजक रेखा को नष्ट करने के लिए इसका उपयोग आधार रूप में कर सकेंगे। उनका अंतिम लक्ष्य स्वायत्तता को स्वतंत्रता में परिणत करना था। स्लोवाकों का राष्ट्रवाद इस योजक से संतुष्ट नहीं हुआ। वे तो इस संधि-रेखा को समाप्त करने के इच्छुक थे। इस संधि-रेखा के लागू होते ही चेकों और स्लोवाकों के बीच उसके स्थान पर एक अवरोध के लिए संघर्ष छिड़ गया। उन्होंने इसकी भी परवाह नहीं की कि इसके