9. विदेशों से सीख - Page 219

210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

लिए कौन से साधन उपयोग में लाए जाने हैं। उनका यह राष्ट्रवाद इतना अधिक गहन और मतिभ्रामक था कि जब वे असफल हुए तो उन्होंने जर्मनों से सहायता की गुहार करने में भी संकोच नहीं किया।

इस तरह तुर्की के और चेकोस्लोवाकिया के विखंडन का गहन अध्ययन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि जब एक बार राष्ट्रवाद की भावना सक्रिय हो उठती है, तो स्थानीय स्वायत्तता अथवा धर्म के बंधन भी उसकी शक्ति का सामना कर पाने में समर्थ नहीं होते।

हिंदुओं के लिए इस शिक्षा को ग्रहण करना ही श्रेयस्कर होगा। उन्हें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि यदि ग्रीक, बाल्कान्स और अरब राष्ट्रवाद ने तुर्की राज्य को ध्वस्त कर दिया और यदि स्लोवाक राष्ट्रवाद ने चेकोस्लोवाकिया को खंडित कर दिया तो भारतीय राज्य को तोड़ने से मुस्लिम राष्ट्रवाद को कौन रोक पाएगा? यदि अन्य राष्ट्रों का अनुभव हमें यह सीख देता है कि भड़काए गए राष्ट्रवाद की परिणति यही होती है, तो हम उनके उदाहरण से लाभ उठाते हुए भारत को हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रूप में विभाजित करने पर सहमत होकर विनाश को क्यों न टाल दें? हिंदुओं को इस चेतावनी को हृदयंगम कर लेना चाहिए कि यदि उन्होंने स्वतंत्र लोगों के रूप में अपना जीवन शुरू करने से पूर्व भारत को दो खंडों में विभाजित करने से इंकार किया तो उन्हें भी वैसी ही भंवर में फंसना पड़ेगा, जिस तरह तुर्की, चेकोस्लोवाकिया और कई अन्य देश फंसते गए हैं। यदि वे अपने जहाज को सागर के बीच नष्ट होने से बचाना चाहते हैं, तो उन्हें अनावश्यक और फालतू बोझ उससे उतारकर फेंकना होगा और उसे गतिमय करने के लिए हल्का करना होगा। वे अपनी यात्रा को बड़ी सीमा तक आसान कर लेंगे यदि वे प्रोफेसर टोयनबी के शब्दों में यह मार्ग चुनें कि जहाज पर रखे ज्वलनशील और अवांछित सामान को फेंक कर उसे हल्का करने में ही संतोष का अनुभव करें।

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क्या पाकिस्तान और हिंदुस्तान के रूप में भारत का विभाजन मान लेने से हिंदू वास्तव में ही घाटे में रहेंगे?

चेकोस्लोवाकिया के बारे में म्यूनिख समझौते के फलस्वरूप अपने कुछ क्षेत्रों को गंवाने पर वहां की सरकार की वास्तविक भावनाओं पर ध्यान देना भी शिक्षाप्रद होगा। चेकोस्लोवाकिया के प्रधानमंत्री ने उन भावनाओं की अभिव्यक्ति चेकोस्लोवाकिया की जनता के नाम अपने संदेश में बड़े स्पष्ट शब्दों में की थी। उन्होंने कहा थाः