विदेशों से सीख
211
फ्नागरिकों और सैनिकों........ मैं अपने जीवन के कठोरतम समय से गुजर रहा हूं। मैं जिस नितांत दुखदायक दायित्व का निर्वहन कर रहा हूं वह मृत्यु से भी अधिक कठोर है। परंतु मैं स्पष्ट रूप से यही कहूंगा कि मैंने संघर्ष किया है और क्योंकि मैं जानता हूं कि किन परिस्थितियों में युद्ध में विजय पाई जाती है, मुझे आप लोगों को स्पष्ट रूप से यह बताना ही चाहिए कि हमारी विरोधी शक्तियों ने इस घड़ी में हमें उनके अधिक शक्तिशाली होने और उनकी कार्य-पद्धति को मान्यता देने, और तदनुसार व्यवहार करने पर बाध्य किया है।
फ्म्यूनिख में चार यूरोपीय महाशक्तियों ने बैठक की ओर हमसे यह मांग करने का निश्चय किया कि हम नई सीमाओं को स्वीकार कर लें, जिसके अनुसार हमारे राज्य के जर्मन क्षेत्र हमसे ले लिए जाएंगे। हमें हताश और निराशाजनक रक्षा के बीच चुनाव करना था, जिसका तात्पर्य होता वयस्क पीढ़ी का ही नहीं, अपितु स्त्रियों और बच्चों का भी बलिदान और उन शर्तों का जो निर्मम हैं और युद्ध के ही दबाव से थोपी गई हैं, और जिनका इतिहास में अन्य समानांतर उदाहरण भी नहीं मिलता। हमने शांति के लिए योगदान की आकांक्षा की थी, हम सहर्ष यह काम करते, परंतु इस तरह नहीं, जिस प्रकार बलपूर्वक वह हम पर थोपी गई है।
फ्किंतु हमारा साथ छोड़ दिया गया और हम अकेले पड़ गए थे....अत्यधिक दुःखी होते हुए, आपके सभी नेताओं ने सेना और गणराज्य के राष्ट्रपति के साथ मिलकर सभी शेष संभावनाओं पर विचार किया। उन्होंने यह स्वीकार किया कि संकुचित सीमाओं और राष्ट्र की मृत्यु, इन दोनों के बीच चयन करते हुए अपनी जनता के जीवन की रक्षा करना ही उनका पावन कर्तव्य है, ताकि हम इस भयावह समय में और दुर्बल न हो जाएं, ताकि हम इस बारे में सुनिश्चित रह सकें कि हमारा राष्ट्र एक बार पुनः अपने को साहस से जुटा सकेगा, जैसा कि उसने अतीत में प्रायः किया है। हम सभी को यह देखना होगा कि हमारा राज्य स्वयं को अपनी नई सीमाओं के भीतर सुदृढ़ता से पुनर्स्थापित करे, और जनता शांति और फलदायक श्रम के नवजीवन के प्रति आश्वस्त हो सके। आपकी सहायता से हम इसमें सफल होंगे। हमें आप पर भरोसा है और आपको हम पर विश्वास।य्ऽ
ऽ अलेक्जेंडर हैंडरसन, ‘आई विटनेस इन चेकोस्लोवाकिया’, (इलाराप - 1939), पृ. 229-30