सामाजिक निष्क्रियता
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कानून के ये तमाम प्रावधान महिला के पक्ष में होने पर भी मुस्लिम महिला विश्व भर में सर्वाधिक असहाय अवस्था में है। मिस्र के एक मुस्लिम नेता के शब्दों मेंः
फ्इस्लाम ने महिला पर हीनता की मोहर लगा दी है तथा सामाजिक प्रथाओं
को धर्म की स्वीकृति देकर उसे आत्म-अभिव्यक्ति और व्यक्तित्व के
विकास के सभी अवसरों से वंचित कर दिया है।य्
किसी भी मुस्लिम लड़की को अपने विवाह को अमान्य करने का साहस नहीं है, यद्यपि इस आधार पर उसे छूट हो सकती है कि वह नाबालिक थी और यह विवाह उसके माता-पिता ने नहीं अन्य लोगों ने कराया था। कोई भी मुस्लिम पत्नी यह उचित नहीं समझेगी कि उसके निकाह के अनुबंध में यह धारा भी शामिल की जाए कि उसे तलाक लेने का अधिकार है। ऐसे में उसका प्रारब्ध यही होगा कि एक बार का निकाह, हमेशा के लिए निकाह। वैवाहिक अनुबंध कैसा भी क्लेशप्रद क्यों न हो, विवाह के बंधन से वह बच नहीं सकती, विवाह को अमान्य नहीं कर सकती, जबकि वहीं पति को बिना कोई कारण दर्शाए ऐसा करने की हमेशा छूट है। ‘तलाक’ शब्द का उच्चारण करने और उसके तीन सप्ताह तक आत्मसंयम का निर्वाह करने के बाद पति को अलग किया जा सकता है। पति की मर्जी की राह में एकमात्र रुकावट मेहर की अदायगी का दायित्व है। यदि मेहर का परित्याग किया जा चुका है या उसका भुगतान किया जा चुका है, तो तलाक का हक उसकी मन की मौज का ही मामला है।
तलाक के मामले में ऐसी उदारता से सुरक्षा की वह अनुभूति नष्ट हो जाती है जो एक महिला के पूर्णतः मुक्त और सुखद जीवन की परमावश्यक आधारशिला है। मुस्ल्मि महिला के जीवन की यह असुरक्षा उस समय और अधिक बढ़ जाती है, जब उसके पति को बहु विवाह करने और रखैल रखने का कानूनन अधिकार प्राप्त हो जाता है।
मुस्लिम कानून मुसलमानों को चार महिलाओं से एक समय पर विवाह करने की अनुमति देता है। इसे इसलिए कोई असामान्य बात नहीं कहा जाता कि यह व्यवस्था उस हिंदू कानून की तुलना में अधिक प्रगतिशील है जिसमें किसी हिंदू पर इस मामले में कोई रोक नहीं है कि वह कितनी ही पत्नियां रख सकता है। परंतु इस तथ्य को विस्मृत कर दिया जाता है कि चार कानूनी पत्नियों के अलावा मुस्ल्मि कानून एक मुसलमान को अपनी महिला गुलामों से भी सहवास करने की अनुमति देता है। महिला गुलामों की संख्या के बारे में उस कानून में कुछ भी नहीं बताया गया है। उसे यह