220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
भी अधिकार है कि वह बिना किसी रुकावट अथवा कृतज्ञता के उन गुलामों को अपने साथ रख सकता है। उस पर यह बंधन भी नहीं है कि वह उनसे विवाह करे।
बहु विवाह करने तथा रखैल रखने की प्रथा विशेष रूप से मुस्लिम महिला के लिए जिस तरह दुःखदायी है, उसका तथा उसके कारण जो अनेक बुराइयां जन्मती हैं उनका समुचित रूप से वर्णन करने के लिए शब्द नहीं मिल पाते। यह सच है कि बहु विवाह और रखैलें रखने की स्वीकृति के बावजूद किसी को यह नहीं सोच लेना चाहिए कि मुसलमानों में आम तौर पर ऐसा होता है_ और भी यह तथ्य तो बना ही रहता है कि ये ऐसे विशेषाधिकार हैं जिनका आसानी से दुरुपयोग करते हुए कोई भी मुसलमान अपनी पत्नी के जीवन में दुःखों और कष्टों का विष घोल सकता है। श्री जॉन जे. पूल. जो इस्लाम के शत्रु नहीं हैं, का कथन हैः
फ्तलाक के मामले में इस छूट का कुछ मुसलमान बहुत अधिक लाभ उठाते
हैं। स्टोवार्ट ने इस विषय पर टिप्पणी करते हुए अपनी पुस्तक ‘इस्लाम एंड
इट्स फाउंडर’ में कहा है - कुछ मुसलमानों ने लगातार अपनी बीबियां
बदलते रहना अपनी आदत बना ली है। हमने ऐसे नौजवानों के बारे में
पढ़ा है जिनकी बीस और तीस पत्नियां हैं। हर तीसरे-चौथे महीने वे एक
नई बीबी ले आते हैं, और इस प्रकार ऐसा होता है कि एक पुरुष से दूसरे
पुरुष तक महिलाओं को हस्तांतरित करने का निरंतर एक सिलसिला चलता
रहता है। उन महिलाओं को कभी एक को पति मानना पड़ता है, तो कभी
दूसरे घर का द्वार देखना पड़ता है, अथवा बेसहारा या निराश्रित स्थिति को
झेलते हुए तलाक दे दिए जाने का परिणाम भुगतती रहती हैं। जीवनयापन
के लिए ऐसे में वह कुछ दूसरे अधिक तुच्छ और निम्न साधनों का सहारा
लेती हैं इस तरह कानून का अक्षरशः पालन करते हुए और संभवतः
एक अथवा निश्चित रूप से चार, से अधिक पत्नियां न रखते हुए भी
घृणित चरित्र वाले लोग तलाक का सहारा लेकर अपने जीवन-काल में
चाहे जितनी पत्नियां रख सकते हैं।
एक दूसरे तरीके से भी एक मुसलमान चार से अधिक पत्नियां रख
सकता है, और फिर भी कानून के अंतर्गत रह सकता है। यह तरीका रखैलों
के साथ रहने का है, जिनकी कुरान ने खुलकर इजाजत दी है। कुरान की
जिस ‘सूरा’ में चार पत्नियां रखने की अनुमति है, ये शब्द भी हैं - ‘जिन
दासियों को तुमने प्राप्त किया है। फिर 70वीं ‘सूरा’ में यह बताया गया है
कि दासियों के साथ रहना कोई पाप नहीं है। वे शब्द ये हैं - वे गुलाम