1. लीग की मांगे क्या हैं? - Page 23

14 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

से पृथक एक अलग भाषायी समूह के तौर पर चिह्नित कर सके। इसके विपरीत, दोनों के बीच पूर्ण भाषायी एकता है। पंजाब में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही पंजाबी बोलते हैं। सिंध में दोनों सिंधी बोलते हैं। बंगाल में दोनों बंगाली बोलते हैं। गुजरात में दोनों गुजराती बोलते हैं। महाराष्ट्र में दोनों मराठी बोलते हैं। ऐसा ही हर प्रांत में है। केवल नगरों में ही मुसलमान उर्दू बोलते हैं, जबकि हिंदू प्रांतीय भाषा का प्रयोग करते हैं। परंतु बाहर, विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में, हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पूर्ण भाषायी सादृश्य है। तीसरी बात यह कही जाती है कि भारत वह भूमि है जिसमें हिंदू और मुसलमान सदियों से साथ-साथ रहते रहे हैं। यह मात्र जातीय एकता की ही नहीं अपितु दोनों समुदायों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की कतिपय और सांझी विशेषताओं की बात भी की जाती है। यह भी कहा जाता है कि अनेक मुस्लिम वर्गों का सामाजिक जीवन हिंदू रीति-रिवाजों से परिपूरित है। उदाहरण के लिए, पंजाब के आवास। हालांकि ये लगभग सभी मुसलमान हैं, लेकिन अपने हिंदू नाम कायम रखे हुए हैं और अपनी वंशावलियां, ब्राह्मण विधि से ही रखते हैं। मुसलमानों में भी हिंदू उपनाम पाए जाते हैं। उदाहरणतः चौधरी एक हिंदू उपनाम है, परंतु संयुक्त प्रांत और उत्तर भारत के मुसलमानों में भी यह सामान्य उपनाम है। विवाह के मामले में भी कुछ मुस्लिम समुदाय तो नाममात्र के ही मुसलमान हैं। वे विवाह-समारोह में या तो हिंदू-विधि का पालन करते है। अिवा पहले हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार विवाह संपन्न करते हैं। और फिर काजी को बुलाकर मुस्लिम विधि से संपन्न कराते हैं। मुसलमानों के कतिपय वर्गों में विवाह, संरक्षकता और उत्तराधिकारिता के मामलों के कतिपय वर्गों में विवाह, संरक्षकता और उत्तराधिकारिता के मामलों में हिंदू कानून ही लागू होता है। शरीयत अधिनियम पारित होने से पहले पंजाब और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में इसका चलन था। सामाजिक क्षेत्र में हिंदू समाज की भांति ही मुस्लिम समाज में भी जाति-प्रथा पाई जाती हैं। धार्मिक क्षेत्र में यह पता चलता है कि अनेक मुसलमान पीरों के हिंदू शिष्य रहे हैं और उसी तरह से हिंदू योगियों के अनेक मुस्ल्मि शिष्य हैं। दोनों मतों के संतों के बीच मैत्री के उदाहरणों को भी आधार बनाया जाता है। पंजाब के गिरोट में दो तपस्वियों, जमाली सुल्तान और दियाल भवन की कब्रें साथ-साथ हैं, जो उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में अत्यंत घनिष्ठता से रहते थे और हिंदू व मुसलमान समान रूप से वहां नतमस्तक होते हैं। सन् 1700 के करीब बाबा फत्थू एक मुस्लिम संत थे जिनकी मजार कांगड़ा जिले में रानीताल में उन्हें एक हिंदू संत सोढी गुलाब सिंह से नबी की उपाधि मिली थी।

दूसरी ओर, एक हिंदू संत बाबा शाहाना का मत झंग जिले में माना जाता है कहा जाता है कि वह एक मुस्लिम पीर के चेले थे, जिसने अपने हिंदू अनुयायी का मूल नाम (मिहर) बदलकर मीर शाह कर दिया था।