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एक राष्ट्र का अपने घर के लिए आह्वान

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ये सब बातें निस्संदेह सच हैं। इस बारे में तो कोई प्रश्नचिह्न ही नहीं लगाया जा सकता कि मुसलमानों की विशाल जनसंख्या उसी वंश की है, जिसके हिंदू हैं और यह भी कि सभी मुसलमान एक ही भाषा नहीं बोलते। उनमें से अनेक वही भाषा बोलते हैं जो हिंदुओं द्वारा बोली जाती है, इस वास्तविकता से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इस बात का भी खंडन नहीं किया जा सकता कि कतिपय सामाजिक रीति-रिवाज दोनों में ही समान हैं। कुछ धार्मिक परिपाटियां और पद्धतियां दोनों में समान हैं, यह भी एक वास्तविकता है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सबसे इस निष्कर्ष को समर्थन मिलता है कि हिंदू और मुसलमान मिलकर एक राष्ट्र हैं और इन बातों ने उनमें यह अनुभूति जगाई है कि वे एक-दूसरे के पूरक हैं।

हिंदू तर्क में अनेक खामियां हैं। पहली तो यह है कि जिन बातों को समान वैशिष्ट्य के रूप में पेश किया जाता है, वे सामाजिक संश्लेषण लाने हेतु एक दूसरे के तौर-तरीकों को अपनाने या उनका अनुगमन करने के किसी सजग प्रयास का परिण् ाम नहीं है। दूसरी ओर यह एकरूपता कतिपय विशुद्ध नैसर्गिक कारणों का परिणाम है। अधूरा धर्मांतरण भी ऐसा होने का एक कारण है। भारत जैसे देश में जहां अधिकांश मुस्लिमकरण न तो पूर्ण था और न ही प्रभावी। ऐसा होने का कारण विद्रोह का भय अथवा मनाने के तरीकों अथवा उपदेशों की अपर्याप्तता के कारण प्रचारकों की कमी भी था। अतएव यदि मुस्लिम समुदाय के अनेक वर्ग अपने धार्मिक और सामाजिक जीवन में अपने हिंदू मूल को उद्घाटित करते हैं, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। आंशिक तौर पर इसका एक कारण समान परिवेश को भी माना जा सकता है, जिसमें हिंदू और मुसलमान सदियों से रहते आए हैं। समान माहौल से समान प्रतिक्रिया व्यक्त करते जाने से समान ढंग भी पनपता है। इन समान विशेषताओं का आंशिक कारण यह भी माना जा सकता है कि सम्राट अकबर ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जिस धार्मिक सामंजस्य का सूत्रपात किया था, ये उसी कालखंड के अवशिष्ट हैं। वे ऐसे अतीत का परिणाम हैं। जिसका न वर्तमान है और न भविष्य।

जहां तक जाति की एकता, भाषा की एकता और एक ही देश में रहने के मामले पर आधारित तर्क की बात है, तो यह मामला अलग ही है। यदि ये कारण राष्ट्र के बनाने या बिगाड़ने में निर्मायक हों तो हिंदुओं का यह कहना सही होगा कि जाति, भाषा, समुदाय और निवास के कारण हिंदू और मुसलमान एक ही राष्ट्र के घटक हैं। जहां तक ऐतिहासिक अनुभव का सवाल है, जाति, भाषा अथवा देश - इनमें से कोई भी लोगों को एक राष्ट्र का रूप नहीं दे पाता। इस तर्क को रेनन ने इतने सुसंगत ढंग से रखा है कि उनकी भाषा में किसी प्रकार का परिमार्जन करना असंभव है। बहुत पहले, राष्ट्रीयता के बारे में अपने सुप्रसिद्ध निबंध में रेनन ने टिप्पणी की थी -