सामाजिक निष्क्रियता
223
भानार, हलालखोदर, हिजड़ा, कसबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।
जनगणना-अधीक्षक ने मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था के एक और पक्ष का भी उल्लेख किया है। वह है ‘पंचायत प्रणाली’ का प्रचलन। वह बताते हैंः
फ्पंचायत का प्राधिकार सामाजिक तथा व्यापार संबंधी मामलों तक व्याप्त
है और....अन्य समुदायों के लोगों से विवाह एक ऐसा अपराध है, जिस पर
शासी निकाय कार्रवाई करता है। परिणामतः ये वर्ग भी हिंदू जातियों के
समान ही प्रायः कठोर संगोती हैं, अंतर-विवाह पर रोक ऊंची जातियों से
लेकर नीची जातियों तक लागू है। उदाहरणतः कोई धूमा अपनी ही जाति
अर्थात् धूमा में ही विवाह कर सकता है। यदि इस नियम की अवहेलना
की जाती है तो ऐसा करने वाले को तत्काल पंचायत के समक्ष पेश किया
जाता है। एक जाति को कोई भी व्यक्ति आसानी से किसी दूसरी जाति में
प्रवेश नहीं ले पाता और उसे अपनी उसी जाति का नाम कायम रखना पड़ता
है, जिसमें उसने जन्म लिया है। यदि वह अपना विशिष्ट पेशा त्यागकर
जीवनयापन के लिए कोई अन्य साधन भी अपना लेता है, तब भी उसे
उसी समुदाय का माना जाता है, जिसमें कि उसने जन्म लिया था......हजारों
जुलाहें कसाई का धंधा अपना चुके हैं, किंतु वे अब भी जुलाहे ही कहे
जाते हैं।य्
इसी तरह के तथ्य अन्य भारतीय प्रांतों के बारे में भी वहां की जनगणना रिपोर्टों से वे लोग एकत्रित कर सकते हैं, जो उनका उल्लेख करना चाहते हों। परंतु बंगाल के तथ्य ही यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि मुसलमानों में जाति प्रथा ही नहीं, छूआछूत भी प्रचलित है।
इस तरह से यह असंदिग्ध रूप से स्पष्ट है कि भारत में मुस्लिम समाज भी हिंदू समाज में प्रचलित सामाजिक बुराइयों से अछूता नहीं है। वस्तुतः मुसलमानों में हिंदुओं की तमाम सामाजिक बुराइयां तो हैं। ही, कुछ और बुराइयां भी हैं। मसलन एक है मुस्लिम महिलाओं के लिए अनिवार्य पर्दा प्रथा।
पर्दा प्रथा के परिणामस्वरूप, मुस्लिम महिलाओं का अलगाव सुनिश्चित है। महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे बाहर के कमरों, बरामदों और बगीचों में न आएं। उनका निवास मकान के पिछले भाग में होता है। सभी महिलाओं को चाहे वे जवान हों या वृद्धा, एक ही कमरे में रहना पड़ता है। कोई भी पुरुष नौकर उनकी उपस्थिति में काम नहीं कर सकता। महिला को अपने पुत्रों, भाइयों, पिता,