224 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
चाचा और पति अथवा किसी ऐसे ही नजदीकी रिश्तेदार को देखने की अनुमति है, वही विश्वासपात्र होने पर घर में प्रवेश पा सकता है। वह इबादत के लिए मस्जिद में भी नहीं जा सकती और जब कभी उसे बाहर जाना होता है तो बुर्का ओढ़ना पड़ता है। ऐसी पृथकता का मुस्लिम महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़े बिना नहीं रह पाता। वे प्रायः खून की कमी, क्षयरोग, पायरिया और कतिपय अन्य रोगों से पीडि़त हो जाती हैं। उनके शरीर में भी सुघढ़ता नहीं रहती, उनकी कमर झुकती जाती है, हड्डियां निकल आती हैं, हाथ और पांव में खम पड़ जाता है, वे कुरुप हो जाती हैं। पसलियों, जोड़ों और प्रायः सभी हड्डियों में दर्द रहता है। उनके हृदय की धड़कन बढ़ने का सिलसिला भी प्रायः पाया जाता है। इन सभी कमजोरियों के फलस्वरूप, प्रसूतिकाल में उनकी मृत्यु हो जाती है। पर्दा प्रथा के कारण मुस्लिम महिलाओं का मानसिक और नैतिक विकास नहीं होता। स्वस्थ सामाजिक जीवन से वंचित रहने से उनमें अनैतिकता की प्रवृत्ति आ जाती है। बाहरी दुनिया से पूर्णतः अलग-थलग रहने के कारण उनका ध्यान तुच्छ पारिवारिक झगड़ों में उलझा रहता है। फलस्वरूप वे अपनी सोच में संकीर्ण हो जाती हैं और उनका दृष्टिकोण भी संकुचित हो जाता है।
वे अन्य जातियों की बहनों से पिछड़ जाती हैं। वे किसी बाह्य गतिविधि में भाग नहीं ले पातीं और उनमें एक प्रकार की दासता और हीनता की मनोवृत्ति बनी रहती है। उनमें ज्ञान प्राप्ति की इच्छा भी नहीं रहती, क्योंकि उन्हें यही सिखाया जाता है कि घर की चारदीवारी के बाहर वे अन्य किसी बात में रुचि न लें। पर्देवाली महिलाएं प्रायः डरपोक, निस्सहाय, शर्मीली और जीवन में किसी भी प्रकार का संघर्ष करने के अयोग्य हो जाती हैं। भारत के मुसलमानों में पर्दा करने वाली महिलाओं की विशाल संख्या को देखते हुए कोई भी आसानी से यह समझ सकता है कि पर्दे की समस्या कितनी व्यापक और गंभीर है।ऽ
पर्दे का शारीरिक और बौद्धिक प्रभाव भौतिक प्रभाव के मुकाबले काफी कम पड़ता है। वस्तुतः पर्दा प्रथा दो मूल पुरुष और महिला दोनों में ही यौन संबंधी इच्छा को लेकर गहन संदेह में निहित है और इसका उद्देश्य स्त्री-पुरुष दोनों को अलग रखकर रोकना ही है। परंतु इस उद्देश्य की प्राप्ति के बजाए पर्दा प्रथा ने मुस्लिम पुरुषों की नैतिकता पर विपरीत प्रभाव डाला है। पर्दा प्रथा के कारण कोई मुसलमान अपने घर-परिवार से बाहर की महिलाओं से कोई परिचय नहीं कर पाता है। घर की महिलाओं से भी उसका संपर्क यदा-कदा बातचीत तक ही सीमित रहता है। बच्चों अथवा वृद्धों के अलावा, पुरुष अन्य महिलाओं से हिल-मिल नहीं सकता, अंतरंग साथी से भी नहीं मिल पाता। महिलाओं से पुरुषों की यह पृथकता निश्चित रूप से पुरुष के नैतिक बल पर विकृत प्रभाव डालती है। यह कहने के लिए किसी मनोवैज्ञानिक की