10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 234

सामाजिक निष्क्रियता

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आवश्यकता नहीं कि ऐसी सामाजिक प्रणाली से, जो पुरुषों और महिलाओं के बीच के संपर्क को काट दे, यौनाचार के प्रति ऐसी अस्वस्थ प्रवृत्ति का सृजन होता है जो अप्राकृतिक एवं अन्य दूषित आदतों ओर साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है।

पर्दा प्रथा की बुराई का प्रभाव केवल मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित नहीं है। यह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सार्वजनिक जीवन में अभिशाप बनी सामाजिक पृथकता के लिए भी जिम्मेदार है। यह तर्क अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है कि इस पृथकता के लिए मुसलमानों की पर्दा-प्रथा के बजाए हिंदुओं की असामाजिक प्रवृत्तियां भी जिम्मेदार हैं, परंतु हिंदू जब यह कहते हैं तो सही ही कहते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सामाजिक संपर्क की स्थापना संभव नहीं हो पाती, क्योंकि ऐसे संपर्क से तात्पर्य एक ओर की महिलाओं और दूसरी ओर के पुरुषों के बीच संबंध होना ही होगा।ऽ

ऐसा नहीं कि पर्दा और ऐसी ही अन्य बुराइयां देश के कुछ भागों में हिदुंओं के कई वर्गों में प्रचलित नहीं हैं। परंतु अंतर केवल यही है कि मुसलमानों में पर्दा प्रथा को एक धार्मिक आधार पर मान्यता दी गई है, जबकि हिंदुओं में ऐसी स्थिति नहीं है। हिंदुओं की अपेक्षा मुसलमानों में पर्दा प्रथा की जड़ें गहरी हैं और उसे सामाजिक आवश्यकताओं और धार्मिक अंकुशों के बीच अनिवार्य संघर्ष को झेलकर ही समाप्त किया जा सकता है। मुसलमानों में पर्दा प्रथा, अपने मूल के अलावा, एक वास्तविक समस्या है, जबकि हिंदुओं में नहीं है। मुसलमानों ने इसे समाप्त करने का कभी प्रयास किया हो, इसका भी कोई साक्ष्य नहीं मिलता।

इस तरह भारत के मुस्लिम समुदाय के सामाजिक जीवन में ही नहीं, बल्कि राजनीतिक जीवन में भी एक प्रकार की गतिहीनता है। मुसलमानों को राजनीति में कोई रुचि नहीं है। उनकी मजहब में ही अधिक रुचि है। किसी सीट पर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी के समक्ष उसके मुस्लिम क्षेत्र से जो शर्तें रखी जाती हैं, उनसे यह बात आसानी से स्पष्ट हो जाती है। मुस्लिम मतदाता प्रत्याशी के कार्यक्रम पर दृष्टिपात करने की भी परवाह नहीं करते। यह वर्ग प्रत्याशी से मात्र यही चाहता है कि वह मस्जिद के पुराने बल्बों के स्थान पर अपने खर्चे से नए बल्ब लगवा दें, क्योंकि पुराने बल्ब टिमटिमाने लगे हैं_ पुराने कालीन की जगह नया कालीन बिछा दें और मस्जिद की मरम्मत करा दें। कुछ स्थानों पर मुस्लिम मतदाता इतने से ही संतुष्ट हो जाते हैं कि प्रत्याशी एक शानदार दावत देने को तैयार हो जाता है, और कुछ इस पर कि वह ऊंचा दांव लगाकर वोट खरीदने को रज़ामंद हो जाता है। मुसलमानों के लिए चुनाव पैसे का मामला ही है। उन्हें इस बात में रुचि नहीं होती कि यह सामान्य सुधार के

ऽ मुस्लिम महिलाओं की स्थिति के लिए देखिए श्याम कुमार नेहरू द्वारा संपादित ‘अवर काज़।’