10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 235

226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

सामाजिक कार्यक्रम का साधन बन सकता है। मुस्ल्मि राजनीति विशुद्ध धर्मनिरपेक्ष श्रेणी के जीवन, अर्थात् धनी और निर्धन, पूंजी और श्रम, भूमिपति और पट्टठ्ठेदार, पुजारी और जन-सामान्य, तर्क और अंधविश्वास के बीच अंतर जैसी बातों पर ध्यान नहीं देती। मुस्लिम राजनीति अनिवार्यतः मुल्लाओं की राजनीति है और वह मात्र एक अंतर को ही मान्यता देती है - हिदूं और मुसलमानों के बीच मौजूद अंतर। जीवन के किसी भी धर्मनिरपेक्ष तत्व का मुस्लिम समुदाय की राजनीति में कोई स्थान नहीं है, और वे मुस्लिम राजनीतिक जमात के केवल एक ही निर्देशक सिद्धांत के सामने नतमस्तक होते हैं, जिसे मज़हब कहा जाता है।

II

मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुःखद है। किंतु उससे भी अधिक दुःखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज-सुधार का ऐसा कोई संगठित आंदोलन नहीं उभरा जो इन बुराइयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिंदुओं में भी अनेक सामाजिक बुराइयां हैं। परंतु संतोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराइयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आंदोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर, मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराइयां हैं। परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केंद्रीय असेंबली में 1930 में पेश किए गए बाल-विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह-योग्य आयु 14 वर्ष और लड़के की 18 वर्ष करने का प्रावधान था। मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रंथ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा। उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञा अभियान भी छेड़ा। सौभाग्य से उक्त अधिनियम के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा छेड़ा गया वह अभियान फेल नहीं हो पाया, और उन्हीं दिनों कांग्रेस द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन में समा गया। परंतु उस अभियान से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि मुसलमान समाज सुधार के

ऽ यह बात दिलचस्प है कि इस तर्क का उपयोग यूरोपियन अपने बचाव में करते हैं, जिन पर भारतीय

यह आरोप लगाते हैं। कि वे उन्हें अपने क्लबों में प्रवेश नहीं करने देते। वे कहते हैं कि ‘हम अपनी

महिलाओं को क्लबों में लाते हैं। यदि आप अपनी महिलाओं को क्लबों में लाएं, तो आप आ सकते

हैं, परन्तु उस स्थिति में हम अपनी महिलाओं को आपके साथ की अनुमति नहीं दे सकते, जब आप

अपनी महिलाओं को ऐसा नहीं करने देते। जब आप इस बात के लिए तैयार हों, तभी आप हमारे क्लबों

में प्रवेश पाने को कह सकते हैं।’