सामाजिक निष्क्रियता
कितने प्रबल विरोधी हैं।
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प्रश्न किया जा सकता है कि मुसलमान समाज-सुधार के विरोधी क्यों हैं?
इसका सामान्य उत्तर यह है कि विश्व भर के मुसलमान ही प्रगतिशील नहीं है। यह ऐतिहासिक तथ्य है। उनकी सक्रियता के प्रथम स्फुरण के बाद - जिसका स्वरूप निस्संदेह विशाल था और उससे बड़े साम्राज्यों की नींव रखी गई - मुसलमान सहसा ही सुषुप्तावस्था की स्थिति में जा पड़े। ऐसा लगता है कि उस तंद्रा अवस्था से वे कभी नहीं जगे। इस स्थिति के अध्येताओं ने उनकी इस तंद्रा का कारण यह बताया है कि सभी मुसलमानों में यह धारणा मूलबद्ध रही है कि इस्लाम एक विश्व-धर्म है, जो प्रत्येक काल और परिस्थिति में सभी लोगों के लिए उपयुक्त है। यह भी प्रतिपादित किया गया है किः
फ्मुसलमान ने अपने मज़हब के प्रति आस्थावान रहते हुए प्रगति नहीं की,
वह तेजी से आगे बढ़ रही इस आधुनिक दुनिया में भी जड़वत् रहा है।
इस्लाम की एक विशेषता यह रही है कि वह जिन जातियों को दास बनाता
है, उनकी स्वभावगत बर्बरता को भी अविचल कर देता है। यह सोच में
स्थिर है, निश्चेष्ट है और अभेद्य है। यह अपरिवर्तनीय है, और राजनीतिक
सामाजिक अथवा आर्थिक परिवर्तनों की उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती।
फ्यह सिखाए जाने के कारण कि इस्लाम के बाहर कोई सुरक्षा नहीं
है, उसके कानून के बाहर कोई सच्चाई नहीं है और उसके आध्यात्मिक
संदेह से हटकर कोई भी सुख नहीं है, मुसलमान अपनी स्वंय की स्थिति
के अलावा और कुछ सोच पाने में असमर्थ हो गए हैं, इस्लामी विचार के
अलावा और कोई विचार उन्हें सुहाता ही नहीं है। मुसलमान को यह पक्का
विश्वास है कि वह पूर्णता के असाधारण स्तर पर पहुंच चुका है, कि वही
पूर्ण सत्य का अधिकारी है, वही पूर्ण विद्वान है और यह सत्य ऐसा नहीं
है जो किसी पुनरावलोकन का मोहताज हो, अपितु यह पूर्ण सत्य है।
मुसलमानों के मज़हबी कानून का विविधतापूर्ण मनुष्यों पर जिनसे
यह दुनिया बनी है, ऐसा प्रभाव पड़ा कि उनके चिंतन, अनुभूति, विचारों
और निर्णय में एकरूपता का प्रादुर्भाव हुआ।य्
यह तर्क दिया जाता है कि यह एकरूपता उन पर शामक प्रभाव डालती है और यह मुसलमानों को केवल हस्तांतरित नहीं की जाती है, बल्कि असहनश्ीलता की भावना से उन पर थोपी जाती है, जो इतनी कठोर और हिंसात्मक प्रवृत्ति के रूप में मुस्लिम जगत के बाहर अन्यत्र कहीं भी नहीं पाई जाती और जो इस्लाम धर्म की शिक्षा