228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
के विरुद्ध विवेकशील विचारधारा को दबाने में संलग्न है। जैसा कि रेनन ने कहा हैः
फ्इस्लाम में गहन आध्यात्मिक और ऐच्छिक एकता है। इसमें मतांधता
का आधिपत्य है। यह एक भरकम कड़ी है जो मानवता ने कभी
धारण नहीं की थी........इस्लाम का मज़हब के रूप में अपना सौंदर्य भी
है....परंतु मानवीय तर्क की कसौटी पर इस्लाम हानिकारक ही सिद्ध हुआ
है। वे मस्तिष्क जिन्हें इसने बाहरी प्रकाश के लिए बंद कर दिया था,
निस्संदेह अपनी स्वयं की आंतरिक सीमाओं में बंद थे, परंतु इसने स्वतंत्र
चिंतन का दमन किया है। मैं यह तो नहीं कहता कि इसने अन्य धर्मों की
तुलना में अधिक सख्ती से यह किया, परंतु अधिक सफलता से तो अवश्य
ही किया। जिन देशों को इसने जीता, उन्हें मानव की तर्कवादी संस्कृति के
लिए एक बंद क्षेत्र बना दिया। जो तथ्य मुसलमान में निश्चय ही विशिष्ट
है, वह है विज्ञान से उसकी घृणा, उसकी यह सोच कि अनुसंधान उपयोगी
नहीं है, तुच्छ तथा लगभग कुफ्र है - प्राकृतिक विज्ञान इसलिए अनुपयोगी
है कि उसमें खुदा से प्रतिद्वंद्विता की कोशिश होती है। ऐतिहासिक विज्ञान
इसलिए कि उसमें इस्लाम से पूर्व काल का वर्णन होता है जिससे प्राचीन
विधर्म पुनर्जीवित हो सकता है.....।य्ऽ
रेनन ने उपसंहार स्वरूप कहा हैः
फ्इस्लाम विज्ञान को शत्रुवत् मानता है, इसलिए वह स्थिर रह गया और
स्थिरता बनी रहना खतरनाक है। इस्लाम स्वंय ही अपने दुर्भाग्य का कारण
बना है। विज्ञान की हत्या कर उसने अपनी ही हत्या कर ली है और इस
आत्महनन के लिए संसार भर में उनकी भर्त्सना होती है।य्
यह उत्तर यद्यपि स्पष्ट है, किंतु सही उत्तर नहीं हो सकता। यदि यही सही होता तो फिर भारत के बाहर सभी मुस्ल्मि देशों में जो हलचल और अंतःक्षोभ उभर रहा है, निरख-परख की भावना, परिवर्तन की भावना और सुधार की आकांक्षा जीवन के हर क्षेत्र में परिलक्षित हो रही है, उसकी सफाई हम क्या देंगे? वस्तुतः तुर्की में जो सामाजिक सुधार हुए हैं, वे बेहद क्रांतिकारी स्वरूप वाले रहे हैं। यदि इन देशों के मुसलमानों की राह में इस्लाम बाधक नहीं बना है तो फिर भारत के मुसलमानों की राह में बाधक क्यों बनेगा? भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक और राजनीतिक जड़ता का कोई विशेष कारण तो होना ही चाहिए।
वह विशेष कारण क्या हो सकता है? मुझे ऐसा लगता है कि भारत के मुसलमानों